देहरादून/चमोली: उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध चारधामों में से एक, भगवान बदरीनाथ धाम को लेकर विवादित बयान देने के मामले में आरोपित मौलवी को अदालत ने बरी कर दिया है। पिछले लंबे समय से चल रहे इस कानूनी मामले में कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि आरोपित के खिलाफ पर्याप्त और ठोस साक्ष्य (Evidence) पेश नहीं किए जा सके। इस फैसले के बाद इस बहुचर्चित विवाद पर कानूनी विराम लग गया है। हालांकि, जब यह मामला सामने आया था, तब पूरे उत्तराखंड समेत देशभर के श्रद्धालुओं में भारी आक्रोश देखा गया था और राज्य के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए थे।
क्या था पूरा विवाद?
यह मामला कुछ समय पहले तब तूल पकड़ा था जब सोशल मीडिया पर एक वीडियो और बयान वायरल हुआ था:
- दावे पर आपत्ति: आरोपित मौलवी पर आरोप था कि उन्होंने बदरीनाथ धाम को लेकर एक ऐसा ऐतिहासिक और धार्मिक दावा किया था जिसे हिंदू संगठनों ने ‘भ्रामक’ और ‘धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला’ बताया था।
- पुलिस कार्रवाई: हिंदू संगठनों की भारी नाराजगी और शिकायतों के बाद पुलिस ने सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने और धार्मिक विद्वेष फैलाने की संबंधित धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया था।
- गिरफ्तारी और जांच: मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपित को हिरासत में लिया था और जांच शुरू की थी।
अदालत का फैसला और मुख्य बिंदु
सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और उपलब्ध दस्तावेजों का बारीकी से अध्ययन किया:
- साक्ष्यों की कमी: बचाव पक्ष के वकीलों ने दलील दी कि आरोपित के खिलाफ लगाए गए आरोप केवल मौखिक हैं और उनके पास ऐसा कोई तकनीकी या दस्तावेजी प्रमाण नहीं है जो अपराध को सिद्ध कर सके।
- संदेह का लाभ: कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि संबंधित बयान वास्तव में सांप्रदायिक हिंसा भड़काने के इरादे से दिया गया था। कानून के सिद्धांतों के अनुसार, ‘संदेह का लाभ’ (Benefit of Doubt) देते हुए आरोपित को बरी कर दिया गया।
- अभिव्यक्ति और मर्यादा: फैसले के दौरान मौखिक रूप से यह भी संकेत दिया गया कि धार्मिक स्थलों के प्रति किसी भी प्रकार की टिप्पणी में मर्यादा का पालन किया जाना चाहिए, लेकिन कानूनी तौर पर सजा के लिए ठोस सबूत अनिवार्य हैं।
हिंदू संगठनों की प्रतिक्रिया
अदालत के इस फैसले पर हिंदू संगठनों ने असंतोष व्यक्त किया है। कई संगठनों का कहना है कि वे इस फैसले का अध्ययन करेंगे और जरूरत पड़ने पर उच्च न्यायालय (High Court) में अपील दायर करने पर विचार करेंगे। उनका तर्क है कि इस तरह की बयानबाजी से देवभूमि की शांत फिजा और धार्मिक परंपराओं पर नकारात्मक असर पड़ता है।





