नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में की गई ‘दिमागी नक्सल’ टिप्पणी को लेकर सियासी विवाद तेज हो गया है। विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री के बयान पर पलटवार करते हुए आरोप लगाया कि सरकार अपने आलोचकों और असहमति रखने वालों को बदनाम करने के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर रही है।
प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा था कि सुरक्षा बलों ने जंगलों में सक्रिय सशस्त्र नक्सलियों के खिलाफ बड़ी सफलता हासिल की है, लेकिन अब ‘दिमागी नक्सल’ एक नई चुनौती के रूप में सामने आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों की पहचान कर उन्हें अलग-थलग करने की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया कि ये तत्व समाज को गलत दिशा में ले जाने और अशांति पैदा करने के अवसर तलाशते हैं।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री की टिप्पणी को राजनीतिक बयानबाजी करार दिया। उन्होंने कहा कि पहले सरकार और भाजपा आलोचकों के लिए ‘अर्बन नक्सल’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती थी और अब ‘दिमागी नक्सल’ शब्द सामने आया है। रमेश ने आरोप लगाया कि असहमति रखने वालों को चरमपंथ से जोड़कर उनकी छवि खराब करने का प्रयास किया जा रहा है।
रमेश ने यह भी कहा कि जिन विचारों या मांगों को पहले ‘अर्बन नक्सल’ सोच बताकर खारिज किया गया, बाद में सरकार ने उन्हीं में से कुछ को स्वीकार किया। उन्होंने जातीय जनगणना का उदाहरण देते हुए प्रधानमंत्री पर राजनीतिक हताशा में ऐसे आरोप लगाने का आरोप लगाया।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि देश में सशस्त्र नक्सलवाद अब अंतिम दौर में है। उन्होंने सुरक्षा अभियानों और विकास योजनाओं को नक्सली हिंसा में कमी का प्रमुख कारण बताया। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि माओवादी विचारधारा का समर्थन करने वाले तत्व अब भी सामाजिक अशांति पैदा करने की कोशिश कर सकते हैं।
विपक्ष के विरोध के बाद ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बयानबाजी और बढ़ने के आसार हैं।





