कोलकाता/सिलीगुड़ी (28 मार्च, 2026): पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के लिए बिगुल बज चुका है और सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीतियां बनाने में जुट गए हैं। इस बार भी उत्तर बंगाल की राजनीति में आदिवासी मतदाता एक अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं। विशेष रूप से दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और अलीपुरद्वार जैसे जिलों में आदिवासी समुदाय के वोट उम्मीदवारों की जीत और हार तय करते हैं, जिससे यह क्षेत्र राजनीतिक दलों के लिए एक बड़ा अखाड़ा बन गया है। उत्तर बंगाल की कुल 54 विधानसभा सीटों में से 16 सीटें आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित हैं, जो यह दर्शाता है कि यह वोट बैंक सत्ता की चाबी holds. यही वजह है कि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) और मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (BJP) इस बार इस वोट बैंक पर अपनी पैनी नज़र गड़ाए हुए हैं और उनके बीच सीधा और कड़ा मुकाबला होने की उम्मीद है।
पिछले चुनाव की सीख: भाजपा का ‘अभेद्य दुर्ग’ और तृणमूल की चुनौतियां
पिछले विधानसभा चुनाव (2021) में उत्तर बंगाल के तराई और डुवार्स इलाकों में तृणमूल कांग्रेस को करारा झटका लगा था:
- भाजपा का वर्चस्व: 2021 के चुनाव में भाजपा ने उत्तर बंगाल में अभूतपूर्व सफलता हासिल की थी। पार्टी ने आदिवासी बहुल अधिकांश सीटों पर जीत दर्ज की थी, जिससे यह क्षेत्र भाजपा का एक मजबूत और ‘अभेद्य दुर्ग’ बन गया था।
- तृणमूल की हार: तृणमूल कांग्रेस इन इलाकों में काफी पिछड़ गई थी और उसे आदिवासी मतदाताओं का समर्थन हासिल करने में कठिनाई हुई थी। पार्टी ने स्वीकार किया कि आदिवासी समुदाय के बीच उसकी पैठ कमजोर थी और उसे अपनी रणनीति में बदलाव करने की आवश्यकता है।
2026 की रणनीति: तृणमूल का ‘आदिवासी कार्ड’ और भाजपा के किले पर वार
2026 के विधानसभा चुनाव में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए, तृणमूल कांग्रेस ने आदिवासी मतदाताओं को साधने के लिए एक नई और आक्रामक रणनीति अपनाई है:
- आदिवासी चेहरों पर दांव: तृणमूल ने इस बार आदिवासी चेहरों पर बड़ा दांव खेला है। पार्टी ने उत्तर बंगाल के प्रमुख आदिवासी नेताओं को सीधे चुनावी मैदान में उतारकर भाजपा के मजबूत दुर्ग में सेंध लगाने की कोशिश की है। इन नेताओं में से कुछ पहले भाजपा के साथ थे, जो तृणमूल के लिए एक बड़ा कूटनीतिक फायदा साबित हो सकता है।
- संगठनात्मक मजबूती: तृणमूल ने उत्तर बंगाल में अपने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने के लिए विशेष प्रयास किए हैं। पार्टी ने आदिवासी समुदाय के बीच अपनी पैठ बढ़ाने के लिए कई नए कार्यक्रमों और पहलों की शुरुआत की है, जैसे ‘आदिवासी संपर्क अभियान’ और ‘डुवार्स संवाद’।
- विकास और कल्याणकारी योजनाएं: तृणमूल सरकार ने उत्तर बंगाल के आदिवासी बहुल इलाकों में विकास कार्यों को गति दी है और कई नई कल्याणकारी योजनाएं शुरू की हैं, जैसे ‘आदिवासी बंधु’ और ‘डुवार्स विकास बोर्ड’। पार्टी इन योजनाओं के माध्यम से आदिवासी समुदाय का विश्वास जीतने की कोशिश कर रही है।





