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पश्चिम एशिया संकट: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने की उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक; तीनों सेना प्रमुखों के साथ सुरक्षा तैयारियों और रणनीतिक विकल्पों पर हुआ मंथन

नई दिल्ली (24 मार्च, 2026): पश्चिम एशिया में गहराते युद्ध के बादलों और ईरान-इजराइल के बीच बढ़ते तनाव के बीच, भारत सरकार ने अपनी रक्षा तैयारियों को चाक-चौबंद करना शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को एक अत्यंत महत्वपूर्ण और उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की। इस बैठक में भारतीय सशस्त्र बलों के तीनों अंगों के प्रमुख—थल सेना, नौसेना और वायुसेना—मौजूद रहे। बैठक का मुख्य उद्देश्य पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री व्यापारिक मार्गों और क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का आकलन करना था। रक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया कि भारत इस क्षेत्र में शांति का पक्षधर है, लेकिन किसी भी आकस्मिक स्थिति से निपटने के लिए हमारी सेनाएं पूरी तरह सतर्क और तैयार हैं।

प्रमुख एजेंडा: सुरक्षा चुनौतियां और रणनीतिक तत्परता

रक्षा मंत्री और सैन्य नेतृत्व के बीच हुई इस मैराथन बैठक में कई संवेदनशील और रणनीतिक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई:

  • समुद्री सुरक्षा पर जोर: लाल सागर (Red Sea) और ओमान की खाड़ी में व्यापारिक जहाजों पर बढ़ते खतरों को देखते हुए, भारतीय नौसेना को अपनी गश्ती बढ़ाने और ‘मर्चेंट वेसल्स’ की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए।
  • आकस्मिक योजना (Contingency Planning): यदि संघर्ष और बढ़ता है, तो क्षेत्र में फंसे लाखों भारतीय नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकालने (Evacuation) के लिए एक विस्तृत ‘एक्शन प्लान’ तैयार रखने पर सहमति बनी।
  • रक्षा तैयारियों की समीक्षा: तीनों सेना प्रमुखों ने रक्षा मंत्री को अपनी-अपनी कमान की परिचालन तत्परता (Operational Readiness) और खुफिया जानकारी साझा करने के तंत्र के बारे में ब्रीफ किया।

तीनों सेना प्रमुखों की उपस्थिति: एक संयुक्त सैन्य दृष्टिकोण

इस बैठक की सबसे बड़ी विशेषता ‘ज्वाइंटनेस’ (Jointness) रही, जहाँ थल, नभ और जल के सेना प्रमुखों ने एक साथ मिलकर उभरते खतरों का विश्लेषण किया:

  1. रणनीतिक तालमेल: बैठक में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) और तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने इस बात पर जोर दिया कि आधुनिक युद्ध की स्थिति में तीनों सेनाओं के बीच सटीक समन्वय ही भारत के हितों की रक्षा कर सकता है।
  2. ऊर्जा और व्यापार मार्ग: रक्षा मंत्री ने विशेष रूप से ऊर्जा सुरक्षा (तेल और गैस की आपूर्ति) से जुड़े समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई और नौसेना को इन मार्गों पर ‘फ्रीडम ऑफ नेविगेशन’ सुनिश्चित करने के लिए मुस्तैद रहने को कहा।

तकनीकी निगरानी: अंतरिक्ष और साइबर डोमेन के माध्यम से क्षेत्र की गतिविधियों पर पैनी नजर रखने के लिए नई तकनीकों और सैटेलाइट डेटा के उपयोग पर भी चर्चा हुई।

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