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नेपाल की राजनीति में भूचाल: पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली गिरफ्तार; ‘जेन-जी’ हिंसक आंदोलन में कथित भूमिका के लगे गंभीर आरोप; नए पीएम बलेंद्र शाह के शपथ ग्रहण के तुरंत बाद बड़ी कार्रवाई

काठमांडू (28 मार्च, 2026): नेपाल की राजनीति में आज एक अत्यंत बड़ा और अप्रत्याशित घटनाक्रम सामने आया है, जिसने पूरे देश और दक्षिण एशिया क्षेत्र में हलचल तेज कर दी है। नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री और प्रमुख कम्युनिस्ट नेता केपी शर्मा ओली (K.P. Sharma Oli) को पिछले साल हुए घातक और हिंसक ‘जेन-जी’ (Gen-Z) विरोध प्रदर्शनों में उनकी कथित भूमिका के गंभीर आरोपों में गिरफ्तार कर लिया गया है। यह सनसनीखेज कार्रवाई ऐसे समय में हुई है, जब नेपाल में सत्ता परिवर्तन हुआ है और नए प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह (Balendra Shah) ने हाल ही में पद की शपथ ली है। सत्ता की बागडोर संभालते ही नई सरकार द्वारा की गई इस पहली और सबसे बड़ी कार्रवाई ने केपी ओली की पार्टी, नेकपा-एमाले (CPN-UML), और उनके समर्थकों को स्तब्ध कर दिया है। केपी ओली की गिरफ्तारी के साथ ही पूर्व गृहमंत्री रमेश लेखक (Ramesh Lekhak) को भी हिरासत में लिया गया है, जो उस समय सरकार का हिस्सा थे और उन पर भी प्रदर्शनों को संभालने में लापरवाही और हिंसा को बढ़ावा देने के आरोप हैं।

‘जेन-जी’ आंदोलन: हिंसा, मौतें और जांच आयोग की रिपोर्ट

‘जेन-जी’ आंदोलन पिछले साल नेपाल में युवाओं द्वारा बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता के खिलाफ शुरू किया गया था, जो बाद में हिंसक हो गया:

  • हिंसक प्रदर्शन: पिछले साल हुए ‘जेन-जी’ विरोध प्रदर्शनों ने नेपाल के कई शहरों, विशेष रूप से काठमांडू घाटी, को हिलाकर रख दिया था। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई हिंसक झड़पों में 70 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों लोग घायल हुए थे, जिनमें सुरक्षाकर्मी भी शामिल थे। प्रदर्शनों के दौरान सरकारी संपत्तियों को भारी नुकसान पहुंचाया गया था और देश की अर्थव्यवस्था ठप हो गई थी।
  • जांच आयोग की रिपोर्ट: प्रदर्शनों की गंभीरता को देखते हुए, तत्कालीन सरकार ने एक उच्च स्तरीय जांच आयोग का गठन किया था। सूत्रों के अनुसार, जांच आयोग की विस्तृत रिपोर्ट में पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली और पूर्व गृहमंत्री रमेश लेखक पर प्रदर्शनों के दौरान हिंसा को उकसाने, भीड़ को नियंत्रित करने में विफल रहने और मानवाधिकारों के उल्लंघन के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। रिपोर्ट में इन नेताओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की सिफारिश की गई थी, जिसे नई सरकार ने लागू कर दिया है।

केपी ओली की गिरफ्तारी: राजनीतिक प्रतिशोध या न्याय की मांग?

केपी ओली की गिरफ्तारी ने नेपाल की राजनीति को दो धड़ों में बांट दिया है, जिससे देश में राजनीतिक तनाव और अस्थिरता बढ़ने की आशंका है:

  1. सत्ता पक्ष का दावा: नए प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह की सरकार का दावा है कि केपी ओली की गिरफ्तारी राजनीतिक प्रतिशोध नहीं, बल्कि ‘जेन-जी’ आंदोलन के पीड़ितों के लिए न्याय सुनिश्चित करने और कानून का शासन स्थापित करने की दिशा में एक आवश्यक कदम है। सरकार का कहना है कि जांच आयोग की रिपोर्ट के आधार पर की गई यह कार्रवाई निष्पक्ष और पारदर्शी है और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।
  2. विपक्ष का आरोप: केपी ओली की पार्टी, नेकपा-एमाले, ने उनकी गिरफ्तारी को ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ और ‘लोकतंत्र की हत्या’ करार दिया है। पार्टी का आरोप है कि नई सरकार विपक्ष को कमजोर करने और अपनी सत्ता को मजबूत करने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है। पार्टी ने केपी ओली की तुरंत रिहाई की मांग की है और देशव्यापी आंदोलन शुरू करने की चेतावनी दी है।

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