इस्लामाबाद/रियाद: वैश्विक भू-राजनीति में एक नया शक्ति केंद्र उभरता दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये एक बड़े त्रिपक्षीय रक्षा समझौते को अंतिम रूप देने के बेहद करीब पहुंच गए हैं। इस प्रस्तावित समझौते का मुख्य उद्देश्य सैन्य प्रशिक्षण, रक्षा उपकरणों का संयुक्त उत्पादन और अत्याधुनिक मिसाइल व ड्रोन तकनीक साझा करना है। राजनयिक सूत्रों के अनुसार, तीनों देशों के वरिष्ठ रक्षा अधिकारियों के बीच कई उच्च स्तरीय बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन कुछ तकनीकी पहलुओं और क्षेत्रीय हितों के टकराव के कारण ‘अंतिम सहमति’ (Final Consensus) अभी बाकी है। यदि यह समझौता होता है, तो यह मध्य-पूर्व और दक्षिण एशिया के रक्षा समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है।
प्रस्तावित समझौते के प्रमुख स्तंभ
इस त्रिपक्षीय सहयोग के पीछे तीनों देशों के अपने-अपने रणनीतिक हित छिपे हैं:
- तकनीकी हस्तांतरण (Technology Transfer): तुर्किये अपने उन्नत ‘बायराक्तर’ ड्रोन और नौसैनिक तकनीक साझा करने को तैयार है, जबकि पाकिस्तान अपनी परमाणु और मिसाइल विशेषज्ञता का लाभ दे सकता है।
- संयुक्त निवेश: सऊदी अरब इस गठबंधन में मुख्य वित्तपोषक (Financier) की भूमिका में होगा, जो रक्षा कारखानों और अनुसंधान एवं विकास (R&D) के लिए भारी निवेश करेगा।
- सैन्य अभ्यास: तीनों सेनाओं के बीच नियमित साझा युद्धाभ्यास और खुफिया जानकारी साझा करने के तंत्र को मजबूत करना।
अंतिम सहमति में कहाँ फंस रहा है पेंच?
जानकारों का मानना है कि इस समझौते पर हस्ताक्षर होने में कुछ महत्वपूर्ण बाधाएं आ रही हैं:
- अमेरिका का प्रभाव: तुर्किये एक नाटो (NATO) सदस्य है और सऊदी अरब के अमेरिका के साथ गहरे रक्षा संबंध हैं। ऐसे में पाकिस्तान के साथ संवेदनशील तकनीक साझा करने पर वाशिंगटन के दबाव का डर बना हुआ है।
- चीन और रूस का फैक्टर: पाकिस्तान के रक्षा संबंध चीन से गहरे हैं, जबकि तुर्किये और सऊदी अरब अपने रक्षा स्रोतों में विविधता चाहते हैं। हितों का यह टकराव समझौते की शर्तों को पेचीदा बना रहा है।
- क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता: ईरान जैसे पड़ोसी देशों की प्रतिक्रिया और इजरायल के साथ सऊदी के बदलते रिश्तों ने भी इस त्रिपक्षीय गुट की रूपरेखा को लेकर संशय पैदा किया है।
पाकिस्तान के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह डील?
आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए यह समझौता किसी ‘संजीवनी’ से कम नहीं होगा:
- रक्षा निर्यात: पाकिस्तान अपने ‘जेएफ-17’ लड़ाकू विमानों और टैंकों के लिए सऊदी अरब के रूप में एक बड़ा बाजार देख रहा है।
- आर्थिक मदद: रक्षा उत्पादन के बहाने सऊदी अरब से मिलने वाला निवेश पाकिस्तान के घटते विदेशी मुद्रा भंडार को सहारा दे सकता है।
यदि पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब एक मंच पर आते हैं, तो यह पश्चिमी देशों के रक्षा एकाधिकार को चुनौती दे सकता है। फिलहाल, तीनों देशों के विदेश मंत्रालय ड्राफ्ट को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि आगामी ‘इस्लामिक सहयोग संगठन’ (OIC) की बैठक के इतर इस पर कोई बड़ी घोषणा हो सकती है। हालांकि, जब तक आधिकारिक हस्ताक्षर नहीं हो जाते, वैश्विक रक्षा गलियारों में कयासों का दौर जारी रहेगा।





