देहरादून/नैनीताल: उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में अब ‘लाल सोना’ यानी सेब किसानों की तकदीर बदलने वाला है। राज्य सरकार और उद्यान विभाग के संयुक्त प्रयासों से अब उत्तराखंड में सेब की ‘अति सघन’ (Ultra High Density Plantation – UHDP) तकनीक को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जा रहा है। इस नई तकनीक के जरिए कम जमीन और कम समय में सेब का रिकॉर्ड उत्पादन किया जा सकेगा। कृषि विशेषज्ञों का दावा है कि यदि किसान वैज्ञानिक पद्धति से इस तकनीक को अपनाते हैं, तो आने वाले कुछ वर्षों में वे सालाना करोड़ों रुपये का टर्नओवर हासिल कर सकेंगे। इससे न केवल पलायन रुकेगा, बल्कि उत्तराखंड दुनिया के मानचित्र पर सेब उत्पादन के एक बड़े हब के रूप में उभरेगा।
क्या है ‘अति सघन’ (UHD) तकनीक?
यह तकनीक पारंपरिक बागवानी से पूरी तरह अलग और अधिक लाभप्रद है:
- पौधों की संख्या: पारंपरिक तकनीक में एक एकड़ में लगभग 100 से 150 पेड़ लगाए जाते हैं, जबकि ‘अति सघन’ तकनीक में आधुनिक ‘रूटस्टॉक’ (M9 जैसे विदेशी मूल के पौधे) की मदद से 1200 से 1500 तक पौधे लगाए जा सकते हैं।
- जल्द उत्पादन: पारंपरिक पेड़ फल देने में 8 से 10 साल लेते हैं, लेकिन इस तकनीक से लगाए गए पेड़ दूसरे या तीसरे साल से ही फल देना शुरू कर देते हैं।
- ड्रिप इरिगेशन और ट्रेलिस सिस्टम: इसमें पेड़ों को तारों के सहारे (Trellis System) सीधा खड़ा किया जाता है और ड्रिप सिंचाई के माध्यम से बूंद-बूंद पानी और खाद दी जाती है।
कैसे बनेंगे किसान करोड़पति? (आर्थिक विश्लेषण)
विशेषज्ञों ने इस तकनीक से होने वाली आय का एक प्रभावशाली खाका पेश किया है:
- उच्च पैदावार: अति सघन बागवानी से प्रति हेक्टेयर उत्पादन 40 से 50 मीट्रिक टन तक पहुंच सकता है, जो पारंपरिक पद्धति से 5-6 गुना अधिक है।
- गुणवत्ता और बाजार भाव: इस तकनीक से पैदा होने वाले सेब का आकार, रंग और स्वाद अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप होता है, जिससे किसानों को मंडियों में और निर्यात करने पर बहुत ऊंचा दाम मिलता है।
- लागत में कमी: पेड़ों की ऊंचाई कम होने के कारण छिड़काव (Spraying) और तुड़ाई (Harvesting) में कम श्रम लगता है, जिससे लागत घटती है और मुनाफा बढ़ता है।
सरकार की प्रोत्साहन योजनाएं
धामी सरकार ने इस तकनीक को घर-घर पहुंचाने के लिए विशेष रियायतों का एलान किया है:
- भारी सब्सिडी: ‘एप्पल मिशन’ के तहत किसानों को नए बाग लगाने के लिए 60 से 80 प्रतिशत तक सब्सिडी प्रदान की जा रही है। इसमें पौधों की खरीद से लेकर बाड़बंदी (Fencing) तक की सहायता शामिल है।
- विदेशी पौधे: सरकार इटली और नीदरलैंड जैसे देशों से उच्च गुणवत्ता वाले रूटस्टॉक मंगवाकर किसानों को उपलब्ध करा रही है।
- तकनीकी प्रशिक्षण: उद्यान विभाग के विशेषज्ञ गांवों में जाकर किसानों को प्रूनिंग (कटाई-छंटाई) और खाद प्रबंधन का विशेष प्रशिक्षण दे रहे हैं।
निष्कर्ष: पर्वतीय अर्थव्यवस्था का नया आधार
उत्तरकाशी, चमोली, नैनीताल और अल्मोड़ा जैसे जिलों में इस तकनीक के शुरुआती परिणाम बेहद उत्साहजनक रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि ‘अति सघन’ सेब उत्पादन उत्तराखंड की जीडीपी (GDP) में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। अब पहाड़ों में खेती केवल गुजर-बसर का साधन नहीं, बल्कि एक मुनाफे वाला बिजनेस बनने की राह पर है।





