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गैरसैंण के विकास को लगेंगे पंख: स्मार्ट सिटी की तर्ज पर संवरेगा भराड़ीसैंण; ग्रीष्मकालीन राजधानी के लिए सरकार का बड़ा मास्टर प्लान

गैरसैंण/देहरादून (14 मार्च, 2026): उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण (भराड़ीसैंण) को लेकर प्रदेश सरकार ने एक महत्वाकांक्षी विजन पेश किया है। लंबे समय से उपेक्षा का शिकार रहे इस पर्वतीय क्षेत्र को अब ‘स्मार्ट सिटी’ के रूप में विकसित करने की तैयारी शुरू कर दी गई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की इस योजना से स्थानीय निवासियों में एक नई उम्मीद जगी है कि अब पहाड़ की राजधानी केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि आधुनिक सुविधाओं से लैस एक आदर्श शहर के रूप में उभरेगी।

अधूरे वादों से आगे: विकास की नई राह

गैरसैंण के विकास को लेकर अतीत में कई घोषणाएं हुईं, जो कागजों से बाहर नहीं निकल पाई थीं:

  • पिछला ट्रैक रिकॉर्ड: पूर्व में गैरसैंण को ‘राज्य राजधानी क्षेत्र’ घोषित करने और नगर पालिका के उन्नयन जैसे बड़े वादे किए गए थे, लेकिन धरातल पर बुनियादी ढांचे की कमी बनी रही।
  • स्मार्ट सिटी का लक्ष्य: अब सरकार ने इसे व्यवस्थित और सुनियोजित तरीके से विकसित करने का निर्णय लिया है। इसके तहत अत्याधुनिक ड्रेनेज सिस्टम, बेहतर सड़कों और डिजिटल कनेक्टिविटी पर जोर दिया जाएगा।

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की मुख्य विशेषताएं

गैरसैंण को स्मार्ट बनाने के लिए सरकार के मास्टर प्लान में निम्नलिखित बिंदु शामिल हैं:

  1. आधुनिक बुनियादी ढांचा: भराड़ीसैंण और आसपास के क्षेत्रों में 24 घंटे बिजली-पानी की आपूर्ति और विश्व स्तरीय परिवहन सुविधाओं का विकास किया जाएगा।
  2. पर्यटन और संस्कृति: चमोली जनपद के इस क्षेत्र को एक ‘ईको-फ्रेंडली’ टूरिस्ट हब के रूप में विकसित किया जाएगा, ताकि ग्रीष्मकालीन सत्र के अलावा भी यहाँ आर्थिक गतिविधियां जारी रहें।
  3. शिक्षा और स्वास्थ्य: क्षेत्र में बेहतर शिक्षण संस्थानों और एक मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल की स्थापना प्रस्तावित है, ताकि स्थानीय लोगों को देहरादून या हल्द्वानी की ओर न भागना पड़े।

पलायन रोकने में मिलेगी मदद

पहाड़ की राजधानी को विकसित करने का सबसे बड़ा लाभ पलायन पर अंकुश लगाना है:

  • स्थानीय रोजगार: निर्माण कार्यों और नए प्रशासनिक ढांचे के खड़े होने से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए द्वार खुलेंगे।
  • पहाड़ की अस्मिता: गैरसैंण को स्मार्ट सिटी बनाना केवल एक निर्माण कार्य नहीं, बल्कि राज्य आंदोलनकारियों की भावनाओं और पहाड़ की अस्मिता को सम्मान देने की एक कोशिश है।

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