Sunday, November 30, 2025

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गवाहों की सुरक्षा के लिए धामी कैबिनेट ने साक्षी संरक्षण योजना-2025 को दी मंजूरी

देहरादून। मुकदमों के गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए राज्य कैबिनेट ने बुधवार को उत्तराखंड साक्षी संरक्षण योजना-2025 को हरी झंडी दे दी। इस योजना से न्याय व्यवस्था को और अधिक सशक्त व निष्पक्ष बनाने में मदद मिलेगी।
कैबिनेट निर्णय के अनुसार, इसके लिए राज्य साक्षी संरक्षण समिति का गठन किया जाएगा, जिसमें न्यायपालिका, पुलिस और जिला स्तर के वरिष्ठ अधिकारी शामिल रहेंगे। यह समिति गवाहों की सुरक्षा आवश्यकताओं का आकलन कर समयबद्ध संरक्षण उपाय तय करेगी।

अधिनियम 2020 हुआ रद्द

इससे पहले प्रदेश में साक्षी संरक्षण अधिनियम 2020 लागू था। लेकिन एक जुलाई 2023 से पूरे देश में सीआरपीसी के स्थान पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस)-2023 लागू हो चुकी है। बीएनएसएस की धारा 398 के तहत गवाहों की सुरक्षा के लिए राज्यों को नई योजना लागू करने के निर्देश दिए गए थे। उसी क्रम में अब अधिनियम 2020 को रद्द कर नई योजना लागू की गई है।
सुरक्षा उपायों का दायरा
नई योजना में पहचान गोपनीयता, स्थान परिवर्तन, संपर्क विवरण में बदलाव, भौतिक सुरक्षा व्यवस्था, और आवश्यकतानुसार वित्तीय सहायता जैसे प्रावधान किए गए हैं। सभी निर्णयों में गोपनीयता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी।

आपदा के कारण तलाशने जुटे विशेषज्ञ

उत्तरकाशी जिले के धराली क्षेत्र में आई आपदा के कारणों की पड़ताल के लिए विशेषज्ञों की टीम सक्रिय है। जांच में केवल बादल फटने की आशंका ही नहीं, बल्कि अन्य सभी पहलुओं को भी देखा जा रहा है। इसके लिए ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हुई वर्षा के आंकड़े विशेष रूप से जुटाए जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऊपरी क्षेत्रों में लगातार दो-तीन दिन तक बारिश होती है, तो वह भी आपदा का कारण बन सकती है। इसी वजह से आपदा वाले दिन और उससे पहले चार दिनों की वर्षा का डेटा एकत्र किया जा रहा है। यह जानकारी वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान द्वारा दो हजार मीटर से अधिक ऊंचाई पर लगाए गए उपकरणों से ली जा रही है।
जांच में वाडिया संस्थान, सीबीआरआई रुड़की, आईआईटी रुड़की और जीएसआई के विशेषज्ञ शामिल हैं। उनका कहना है कि ऊंचाई बढ़ने के साथ वर्षा की तीव्रता भी बदलती है। उदाहरण के लिए गंगोत्री ग्लेशियर क्षेत्र में मानसून अवधि के दौरान लगभग 300 मिमी वर्षा दर्ज हुई, जबकि डोकरानी ग्लेशियर क्षेत्र में यह आंकड़ा 1200 मिमी तक पहुंचा। यानी, समान ऊंचाई (करीब 3800 मीटर) पर भी बारिश की मात्रा में चार गुना तक अंतर देखा गया।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस इलाके में ग्लेशियर पिघलने से बहने वाला पानी और लगातार हुई भारी बारिश मिलकर बड़ी मात्रा में मलबा और बोल्डर नीचे की ओर ला सकते हैं। हालांकि, आपदा के सही कारणों का पता विशेषज्ञों की अंतिम रिपोर्ट के बाद ही चल सकेगा।
आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव विनोद कुमार सुमन ने बताया कि फिलहाल रिपोर्ट उपलब्ध नहीं हुई है।

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