Thursday, March 5, 2026

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ऐतिहासिक कूटनीति: जब भारतीय खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ ने बांग्लादेश की दो धुर विरोधी ‘बेगमों’ को एक मंच पर ला दिया

नई दिल्ली/ढाका: दक्षिण एशियाई राजनीति में बांग्लादेश की दो प्रमुख महिला नेताओं—शेख हसीना और खालिदा जिया—की कट्टर प्रतिद्वंद्विता जगजाहिर रही है। ‘बैटल ऑफ बेगम्स’ के नाम से मशहूर इस सियासी जंग के बीच इतिहास में एक ऐसा मोड़ भी आया था, जब भारत की खुफिया एजेंसी ‘रिसर्च एंड एनालिसिस विंग’ (R&AW) की गुप्त सक्रियता ने इन दोनों धुर विरोधियों को एक साझा लक्ष्य के लिए एकजुट कर दिया था। यह कहानी है 1990 के दशक की, जब बांग्लादेश में सैन्य तानाशाही के अंत के लिए कूटनीति के पर्दे के पीछे एक बड़ी बिसात बिछाई गई थी।

सैन्य शासन के खिलाफ गुप्त गठबंधन

  • इर्शाद का शासन: 1980 के दशक के अंत में बांग्लादेश जनरल हुसैन मोहम्मद इर्शाद के सैन्य शासन के अधीन था। लोकतंत्र पूरी तरह से हाशिए पर था और विपक्ष बिखरा हुआ था।
  • रॉ (R&AW) की रणनीतिक भूमिका: तत्कालीन भारतीय कूटनीतिक रणनीतिकारों और खुफिया अधिकारियों ने यह भांप लिया था कि जब तक शेख हसीना (अवामी लीग) और खालिदा जिया (बीएनपी) एक साथ नहीं आएंगी, तब तक सैन्य तानाशाही को उखाड़ फेंकना नामुमकिन है।
  • असंभव को संभव बनाना: ‘रॉ’ के अधिकारियों ने दोनों नेताओं के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई। अत्यंत गोपनीयता के साथ दोनों खेमों को यह विश्वास दिलाया गया कि लोकतंत्र की बहाली ही उनके राजनीतिक भविष्य के लिए एकमात्र विकल्प है।

विरोध से गठबंधन तक का सफर

इस ऐतिहासिक घटनाक्रम के पीछे के मुख्य कारक निम्नलिखित थे:

  1. साझा शत्रु की पहचान: भारतीय खुफिया इनपुट और कूटनीतिक प्रयासों ने दोनों बेगमों को यह समझाने में सफलता हासिल की कि जनरल इर्शाद उनकी आपसी फूट का फायदा उठा रहे हैं।
  2. 1990 का जन-आंदोलन: ‘रॉ’ के पर्दे के पीछे के प्रयासों का असर यह हुआ कि दोनों नेताओं ने हाथ मिलाया और देशव्यापी आंदोलन छेड़ दिया। इस एकजुटता ने ढाका की सड़कों पर लाखों लोगों को उतार दिया, जिससे सैन्य शासन की नींव हिल गई।
  3. लोकतंत्र की बहाली: अंततः, दिसंबर 1990 में जनरल इर्शाद को पद छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा और बांग्लादेश में संसदीय लोकतंत्र की वापसी का मार्ग प्रशस्त हुआ।

कूटनीति का एक अनूठा अध्याय

यह घटना अंतरराष्ट्रीय संबंधों में इस बात का प्रमाण मानी जाती है कि कैसे खुफिया एजेंसियां केवल सूचनाएं ही नहीं जुटातीं, बल्कि पड़ोसी देशों में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए राजनीतिक समीकरण भी बदल सकती हैं। हालांकि बाद के वर्षों में दोनों बेगमों के बीच की खाई फिर से चौड़ी हो गई, लेकिन 1990 का वह दौर भारत की सॉफ्ट और हार्ड पावर के मिश्रण का एक बेहतरीन उदाहरण था।

वर्तमान संदर्भ में महत्व

आज जब बांग्लादेश फिर से राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है, इतिहास का यह पन्ना याद दिलाता है कि कैसे कूटनीतिक हस्तक्षेप ने एक समय वहां के लोकतंत्र को नई दिशा दी थी। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की सुरक्षा और क्षेत्रीय शांति के लिए बांग्लादेश के इन दो प्रमुख राजनीतिक स्तंभों का संतुलन हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है।

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