नई दिल्ली: वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर एक बार फिर ‘नेशन फर्स्ट’ (राष्ट्र प्रथम) की नीति को दोहराया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आयात को लेकर बनाए जा रहे संभावित दबाव को दरकिनार करते हुए भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि उसकी ऊर्जा नीति किसी भी बाहरी दबाव के बजाय देश की विकास संबंधी जरूरतों और राष्ट्रीय हितों से संचालित होगी। भारत के इस रुख ने साफ कर दिया है कि वह अपनी अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए सस्ती और विश्वसनीय ऊर्जा के स्रोतों से समझौता नहीं करेगा।
दबाव को दरकिनार: रणनीतिक स्वायत्तता की जीत
हालिया कूटनीतिक हलचलों के बीच भारत का यह जवाब उसकी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) को दर्शाता है:
- सस्ती ऊर्जा प्राथमिकता: भारत ने स्पष्ट किया है कि 140 करोड़ लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए वह उन देशों से तेल और गैस खरीदना जारी रखेगा जो उसे किफायती दरों पर उपलब्ध कराएंगे।
- रूस-यूक्रेन संदर्भ: पूर्व में भी अमेरिका द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद पर आपत्ति जताई गई थी, लेकिन भारत ने अपने घरेलू हितों को सर्वोपरि रखते हुए आयात जारी रखा। ट्रंप प्रशासन की नई व्यापार नीतियों के बीच भी भारत का यही रुख बरकरार रहने की उम्मीद है।
‘नेशन फर्स्ट’ रुख के प्रमुख स्तंभ
भारत सरकार ने अपनी ऊर्जा कूटनीति को तीन मुख्य आधारों पर टिकाया है:
- विविधीकरण (Diversification): भारत अब केवल एक क्षेत्र पर निर्भर रहने के बजाय अमेरिका, मध्य पूर्व, रूस और अफ्रीका जैसे विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों से ऊर्जा आयात कर रहा है ताकि किसी भी प्रतिबंध या अस्थिरता के जोखिम को कम किया जा सके।
- आत्मनिर्भर भारत और ग्रीन एनर्जी: ऊर्जा आयात के साथ-साथ भारत सौर, पवन और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में तेजी से निवेश कर रहा है, जिससे भविष्य में विदेशी निर्भरता को कम किया जा सके।
- द्विपक्षीय संबंधों में संतुलन: भारत ने अमेरिका को स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह एक मजबूत व्यापारिक साझेदार है, लेकिन ऊर्जा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर वह अपनी घरेलू मुद्रा स्थिति और महंगाई दर को ध्यान में रखकर ही फैसले लेगा।
ग्लोबल साउथ का नेतृत्व और भारत की आवाज़
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह कड़ा रुख केवल अपने लिए ही नहीं, बल्कि ‘ग्लोबल साउथ’ के उन देशों के लिए भी एक मिसाल है जो अक्सर विकसित देशों की नीतियों के दबाव में आ जाते हैं। भारत ने वैश्विक मंचों पर बार-बार कहा है कि ऊर्जा सुरक्षा का अर्थ केवल आपूर्ति सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि उसे वहनीय (Affordable) बनाना भी है।
निष्कर्ष: विकसित भारत की ओर बढ़ते कदम
भारत का यह संदेश कि वह अपनी ऊर्जा नीति के लिए किसी भी महाशक्ति के दबाव में नहीं आएगा, नई दिल्ली की बढ़ती वैश्विक साख का प्रतीक है। ऊर्जा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के आपसी तालमेल ने यह सुनिश्चित किया है कि भारत की विकास दर को बाधित करने वाला कोई भी बाहरी कारक सफल न हो पाए।
“हमारी प्राथमिकता भारतीय उपभोक्ताओं को सस्ती ऊर्जा प्रदान करना है। हमारी ऊर्जा नीति हमारे राष्ट्रीय हितों और विकास की गति को ध्यान में रखकर बनाई गई है, और इसमें किसी भी बाहरी हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं है।” — वरिष्ठ सरकारी सूत्र





