देहरादून। उत्तराखंड में हर वर्ष बढ़ती वनाग्नि की घटनाओं को देखते हुए राज्य सरकार ने सख्त कदम उठाए हैं। वन विभाग ने खेतों में फसल अवशेष जलाने की प्रक्रिया को नियंत्रित करने के लिए समय सीमा तय कर दी है। 31 मार्च के बाद आड़ा या ओण जलाने की अनुमति सामान्य रूप से नहीं दी जाएगी।
प्रमुख सचिव वन रमेश कुमार सुधांशु ने सभी जिलाधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वनाग्नि की रोकथाम के लिए प्रशासन, वन विभाग और पंचायत स्तर पर समन्वय सुनिश्चित किया जाए। चीड़ बहुल क्षेत्रों को आग की दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील घोषित किया गया है।
सरकार ने निर्देश दिया है कि आग की प्रत्येक घटना का रिकॉर्ड रखा जाए और जिला स्तर पर वनाग्नि प्रबंधन योजना को तत्काल लागू किया जाए। इसके अलावा एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के सहयोग से त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
वन विभाग ने स्थानीय संगठनों, महिला मंगल दल, युवक मंगल दल और स्वयंसेवी संस्थाओं को अग्नि नियंत्रण अभियान में शामिल करने का निर्णय लिया है। साथ ही आग फैलने के मामलों में कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड में वनाग्नि की समस्या केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय चुनौती भी है। यदि प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया, तो इससे वन संपदा और मानव जीवन दोनों को गंभीर नुकसान हो सकता है।





