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उत्तराखंड में धधक रहे जंगल: 27 दिनों में वनाग्नि की 73 घटनाएं; कुमाऊं में भारी नुकसान पर सरकारी वेबसाइट पर ‘शून्य’ रिकॉर्ड

देहरादून (14 मार्च, 2026): उत्तराखंड में गर्मी की दस्तक के साथ ही वनाग्नि (Forest Fire) का तांडव शुरू हो गया है। प्रदेश में आधिकारिक तौर पर फायर सीजन शुरू हुए अभी मात्र 27 दिन ही बीते हैं, लेकिन इस अल्प अवधि में ही आग लगने की 73 घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं। एक ओर जहां कुमाऊं मंडल के जंगलों में आग की लपटें बेशकीमती वन संपदा को राख कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर वन विभाग के रिकॉर्ड और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है।

तापमान में वृद्धि और बढ़ती चुनौतियां

जैसे-जैसे पारे में उछाल आ रहा है, जंगलों की आग विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है:

  • घटनाओं में तेजी: बीते 27 दिनों के भीतर राज्य के विभिन्न हिस्सों से वनाग्नि की 73 रिपोर्ट सामने आई हैं, जो आने वाले भीषण गर्मी के महीनों के लिए एक चेतावनी है।
  • वन संपदा को नुकसान: इन घटनाओं में कई हेक्टेयर वन भूमि प्रभावित हुई है, जिससे न केवल पेड़ों को नुकसान पहुंचा है बल्कि जंगली जानवरों के अस्तित्व पर भी संकट मंडरा रहा है।

विभागीय डेटा पर उठे सवाल: कुमाऊं में आग, वेबसाइट पर सन्नाटा

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला पहलू वन विभाग की रिपोर्टिंग प्रणाली है:

  1. वेबसाइट का ‘शून्य’ रिकॉर्ड: स्थानीय स्तर पर कुमाऊं के जंगलों में आग लगने की कई बड़ी घटनाएं देखी गई हैं, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से वन विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर इन घटनाओं की संख्या ‘शून्य’ प्रदर्शित की जा रही है।
  2. पारदर्शिता का अभाव: सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरण प्रेमियों ने विभाग की इस कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि आंकड़ों को छुपाकर स्थिति को सामान्य दिखाने की कोशिश की जा रही है।
  3. सूचना तंत्र में खामी: कुमाऊं में धुआं और लपटें साफ नजर आ रही हैं, फिर भी डिजिटल रिकॉर्ड में इन्हें दर्ज न किया जाना विभाग के सूचना तंत्र की विफलता की ओर इशारा करता है।

स्थानीय पर्यावरण पर पड़ रहा बुरा असर

जंगलों की आग केवल पेड़ों तक सीमित नहीं है, इसके दूरगामी परिणाम सामने आ रहे हैं:

  • स्मॉग की समस्या: आग के कारण पहाड़ों में धुंध (Smog) की चादर बिछ गई है, जिससे सांस लेने में दिक्कत और आंखों में जलन की शिकायतें बढ़ रही हैं।
  • ग्लेशियरों को खतरा: पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि वनाग्नि से निकलने वाली कार्बन की परतें पास के ग्लेशियरों पर जम सकती हैं, जिससे उनके पिघलने की गति तेज होने का खतरा है।

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