देहरादून: उत्तराखंड सरकार और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) की महत्वाकांक्षी एलिवेटेड रोड परियोजना को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। हाल ही में शासन द्वारा जारी की गई भू-अधिग्रहण (Land Acquisition) की अधिसूचना के बाद प्रभावित क्षेत्रों के किसानों और स्थानीय निवासियों ने मोर्चा खोल दिया है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार विकास के नाम पर उनकी कीमती कृषि भूमि और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को कौड़ियों के दाम पर छीनना चाहती है। भारी विरोध के चलते इस प्रोजेक्ट के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं, जिससे यातायात की समस्या को दूर करने की सरकारी योजना अधर में लटकती दिख रही है।
विवाद की मुख्य वजह: अधिसूचना और मुआवजे का पेंच
इस विरोध प्रदर्शन के केंद्र में भू-अधिग्रहण की प्रक्रिया और उससे जुड़ी शर्तें हैं:
- भूमि की पहचान: प्रशासन ने सड़क निर्माण के दायरे में आने वाली जमीनों को चिह्नित कर नोटिस जारी कर दिए हैं, जिससे सैकड़ों परिवार विस्थापन के डर में हैं।
- मुआवजे की दर: ग्रामीणों का दावा है कि सरकार सर्किल रेट के आधार पर मुआवजा दे रही है, जबकि बाजार भाव उससे कहीं अधिक है।
- उपजाऊ जमीन का नुकसान: किसानों का कहना है कि एलिवेटेड रोड के पिलर और सर्विस रोड के लिए उनकी वह उपजाऊ जमीन ली जा रही है, जो उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है।
प्रोजेक्ट का महत्व बनाम जनता का विरोध
एलिवेटेड रोड प्रोजेक्ट का उद्देश्य शहर को जाम से मुक्ति दिलाना था, लेकिन अब यह एक बड़ी चुनौती बन गया है:
- यातायात समाधान: यह प्रोजेक्ट देहरादून के सबसे व्यस्त मार्गों पर जाम की समस्या को खत्म करने के लिए डिजाइन किया गया था, ताकि चारधाम यात्रियों और स्थानीय लोगों का समय बच सके।
- आंदोलन की चेतावनी: प्रभावित संघर्ष समिति ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि अधिसूचना वापस नहीं ली गई या मुआवजे की शर्तों में बदलाव नहीं किया गया, तो वे निर्माण कार्य शुरू नहीं होने देंगे।
- प्रशासनिक रुख: जिला प्रशासन का कहना है कि अधिग्रहण कानून के तहत ही किया जा रहा है और जनता की आपत्तियों को सुना जाएगा, हालांकि जमीन की पैमाइश का काम जारी है।
पर्यावरण और बसावट पर पड़ने वाला असर
विशेषज्ञों और प्रदर्शनकारियों ने इस प्रोजेक्ट के पारिस्थितिक प्रभाव पर भी सवाल उठाए हैं:
- पेड़ों का कटान: सड़क चौड़ीकरण के लिए सैकड़ों पुराने पेड़ों को काटने की योजना है, जिससे स्थानीय पर्यावरण संतुलन बिगड़ने का खतरा है।
- व्यावसायिक नुकसान: मार्ग के दोनों ओर स्थित दुकानों और छोटे उद्योगों के मालिक भी विस्थापन को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि उनका कहना है कि नया व्यापार खड़ा करना उनके लिए नामुमकिन होगा।
निष्कर्ष: विकास और जनभावना के बीच फंसा प्रोजेक्ट
उत्तराखंड का यह बड़ा एलिवेटेड रोड प्रोजेक्ट अब कूटनीतिक और प्रशासनिक अग्निपरीक्षा के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ राज्य का बढ़ता ट्रैफिक दबाव है जिसके लिए आधुनिक सड़कों की दरकार है, तो दूसरी तरफ उन नागरिकों का हित है जिनकी जमीन पर यह विकास खड़ा होना है। यदि सरकार समय रहते प्रदर्शनकारियों के साथ संवाद स्थापित कर कोई बीच का रास्ता नहीं निकालती, तो करोड़ों रुपये की यह योजना फाइलों में ही दबी रह सकती है।




