Wednesday, March 4, 2026

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उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान में युद्ध जैसे हालात: सैन्य अभियान के डर से 70,000 से अधिक लोगों ने छोड़ा घर; खैबर पख्तूनख्वा में मानवीय संकट गहराया

पेशावर/इस्लामाबाद: पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी प्रांत खैबर पख्तूनख्वा में आतंकवाद विरोधी एक बड़े सैन्य अभियान की आहट ने लाखों लोगों की नींद उड़ा दी है। खुफिया रिपोर्टों और सेना की बढ़ती हलचल के बीच पिछले कुछ दिनों में 70,000 से अधिक स्थानीय निवासियों ने अपने पुश्तैनी घरों को छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन किया है। इलाके में भारी तनाव व्याप्त है और लोग अपने मवेशियों व जरूरी सामान के साथ पैदल ही पलायन करने को मजबूर हैं। स्थानीय लोगों को डर है कि सेना और आतंकियों के बीच होने वाली सीधी जंग में आम नागरिक ‘कोलैटरल डैमेज’ (पार्श्व क्षति) का शिकार हो सकते हैं।

पलायन का मुख्य केंद्र: तीराह घाटी और आसपास के जिले

पलायन का सबसे ज्यादा असर तीराह घाटी, खैबर जिला और उत्तरी वजीरिस्तान के इलाकों में देखा जा रहा है।

  • भारी सैन्य तैनाती: सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तानी सेना ने इन इलाकों में आर्टिलरी और बख्तरबंद गाड़ियों की तैनाती बढ़ा दी है।
  • आतंकी गतिविधियों में वृद्धि: प्रतिबंधित संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) द्वारा सुरक्षा बलों पर किए जा रहे लगातार हमलों के बाद सेना ने ‘सफाई अभियान’ (Clean-up Operation) की योजना बनाई है।

मानवीय संकट: बेघर हुए बुजुर्ग और बच्चे

पलायन कर रहे लोगों के पास रहने और खाने का कोई ठिकाना नहीं है।

  1. अस्थाई शिविरों की कमी: सरकार की ओर से अभी तक पलायन करने वालों के लिए पर्याप्त रिफ्यूजी कैंप नहीं बनाए गए हैं। हजारों परिवार खुले आसमान के नीचे या रिश्तेदारों के घरों में शरण ले रहे हैं।
  2. शिक्षा और स्वास्थ्य ठप: पलायन के कारण बच्चों की पढ़ाई रुक गई है और अस्पतालों में स्टाफ की कमी के चलते स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गई हैं।

स्थानीय नेताओं और मानवाधिकार संगठनों की चिंता

पलायन की इस बड़ी घटना ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों का ध्यान भी खींचा है।

  • दहशत का माहौल: स्थानीय पख्तून नेताओं का आरोप है कि सैन्य अभियानों के नाम पर निर्दोष नागरिकों को परेशान किया जाता है और उनके घरों को निशाना बनाया जाता है।
  • पीटीएम (PTM) का विरोध: पख्तून तहफुज मूवमेंट ने मांग की है कि सेना को युद्ध के बजाय बातचीत का रास्ता अपनाना चाहिए ताकि आम जनता को विस्थापित न होना पड़े।

सेना का रुख: “आतंकवाद का खात्मा जरूरी”

दूसरी ओर, पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता का कहना है कि क्षेत्र में शांति बहाल करने के लिए आतंकियों के सुरक्षित ठिकानों को नष्ट करना अनिवार्य है। सेना ने दावा किया है कि वे केवल चिन्हित आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई करेंगे और नागरिकों की सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाएगा। हालांकि, पिछले अनुभवों (जैसे ऑपरेशन जर्ब-ए-अज्ब) को देखते हुए लोग सेना के आश्वासनों पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं।

वैश्विक स्तर पर प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह पलायन जारी रहा, तो इससे न केवल पाकिस्तान के भीतर आंतरिक संकट पैदा होगा, बल्कि अफगानिस्तान सीमा पर भी दबाव बढ़ेगा। शरणार्थियों की यह बड़ी संख्या आने वाले समय में एक गंभीर खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य संकट को जन्म दे सकती है।

“हम अपना सब कुछ छोड़कर निकल आए हैं। हमें नहीं पता कि जब हम वापस लौटेंगे तो हमारा घर सलामत होगा या नहीं। हम बस अपने बच्चों की जान बचाना चाहते हैं।” — विस्थापित स्थानीय निवासी

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