नई दिल्ली: संसद के वर्तमान सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच चल रहा गतिरोध अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। कांग्रेस की महिला सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) पर बेहद गंभीर और निजी आरोप लगाते हुए कहा है कि वे ‘निष्पक्ष’ होने के बजाय ‘सरकार के दबाव’ में काम कर रहे हैं। महिला सांसदों का यह तीखा हमला उस समय हुआ जब सदन में विपक्ष के नेताओं को बोलने का समय नहीं दिए जाने और माइक बंद किए जाने को लेकर हंगामा चल रहा था। इन आरोपों के बाद सदन की मर्यादा और अध्यक्ष की भूमिका को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है।
किन सांसदों ने लगाए आरोप और क्या है मुख्य मुद्दा?
कांग्रेस की वरिष्ठ महिला सांसदों, जिनमें गौरव गोगोई के साथ अग्रणी भूमिका निभा रही महिला ब्रिगेड शामिल है, ने सदन के बाहर और भीतर अपनी नाराजगी व्यक्त की:
- पक्षपात का आरोप: सांसदों ने आरोप लगाया कि जब भी विपक्ष जनहित के मुद्दे उठाता है, तो अध्यक्ष उन्हें टोक देते हैं या सत्ता पक्ष के मंत्रियों को संरक्षण देते हैं।
- समय का असमान वितरण: महिला सांसदों का दावा है कि बोलने के लिए समय मांगते समय महिला सदस्यों की अनदेखी की जाती है, जो कि संसदीय परंपराओं के खिलाफ है।
- ‘दबाव’ की राजनीति: सांसदों ने सीधे तौर पर कहा, “स्पीकर महोदय, ऐसा लगता है कि आपके हाथ बंधे हुए हैं और आप प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) या सरकार के इशारे पर सदन का संचालन कर रहे हैं।”
सदन के भीतर का घटनाक्रम: तीखी नोकझोंक
विवाद की शुरुआत तब हुई जब सदन में एक महत्वपूर्ण विधेयक पर चर्चा चल रही थी:
- माइक बंद करने की शिकायत: एक महिला सांसद जब अपनी बात रख रही थीं, तो बीच में ही उनका माइक बंद कर दिया गया। इस पर उन्होंने विरोध जताते हुए कहा कि यह उनकी आवाज दबाने की कोशिश है।
- अध्यक्ष की प्रतिक्रिया: लोकसभा अध्यक्ष ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि वे नियमों के तहत ही सदन चला रहे हैं। उन्होंने सांसदों से आग्रह किया कि वे आसन की गरिमा का सम्मान करें और निराधार आरोप न लगाएं।
- विपक्ष का वॉकआउट: अध्यक्ष के स्पष्टीकरण से असंतुष्ट होकर कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों की महिला सांसदों ने सदन से वॉकआउट किया और संसद परिसर में महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने प्रदर्शन किया।
सत्ता पक्ष का पलटवार: ‘अध्यक्ष का अपमान कर रहा विपक्ष’
संसदीय कार्य मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने कांग्रेस महिला सांसदों के इन आरोपों की कड़ी निंदा की है। सरकार की ओर से कहा गया कि:
- अध्यक्ष का पद संवैधानिक होता है और उन पर दबाव का आरोप लगाना पूरे लोकतंत्र का अपमान है।
- विपक्ष के पास कोई ठोस मुद्दा नहीं है, इसलिए वे अब संवैधानिक संस्थाओं और अध्यक्ष की निष्पक्षता पर सवाल उठाकर सुर्खियां बटोरना चाहते हैं।
- सरकार ने मांग की कि जिन सांसदों ने ऐसे अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल किया है, उन्हें सदन से माफी मांगनी चाहिए।





