Wednesday, March 4, 2026

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आदित्य-L1 से सूर्य अध्ययन का नया अध्याय: ISRO ने पहली बार वैज्ञानिकों के लिए खोला ऑब्ज़र्वेशन अवसर

नई दिल्ली।
भारत के पहले सौर वेधशाला मिशन आदित्य-L1 (Aditya L1) को लेकर एक बड़ी वैज्ञानिक पहल सामने आई है। अंतरिक्ष में दो साल से अधिक समय पूरा करने के बाद, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने पहली बार भारतीय वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के लिए इस मिशन से जुड़े ऑब्ज़र्वेशन अवसर (Observation Opportunity) खोल दिए हैं।

ISRO के अनुसार, भारत में कार्यरत सौर और हेलियोस्फेरिक खगोल विज्ञान से जुड़े वैज्ञानिक 6 फरवरी तक अपने रिसर्च प्रस्ताव जमा कर सकते हैं। चयनित प्रस्तावों के लिए पहला ऑब्ज़र्वेशन विंडो अप्रैल से जून 2026 के बीच खुलेगा।

भारत का पहला समर्पित सौर मिशन

आदित्य-L1 को 2 सितंबर 2023 को PSLV रॉकेट के ज़रिए लॉन्च किया गया था। कई जटिल कक्षीय प्रक्रियाओं के बाद यह अंतरिक्ष यान 6 जनवरी 2024 को सूर्य-पृथ्वी प्रणाली के L1 लैग्रेंज पॉइंट की हेलो ऑर्बिट में सफलतापूर्वक स्थापित हुआ। यह बिंदु पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर स्थित है, जहाँ से सूर्य का निरंतर और स्पष्ट अध्ययन संभव होता है।

पहले चरण में दो प्रमुख उपकरणों पर शोध

हालाँकि आदित्य-L1 में कुल 7 वैज्ञानिक पेलोड लगे हैं—

  • 4 रिमोट सेंसिंग के लिए
  • 3 इन-सिटू मापन के लिए

लेकिन पहले ऑब्ज़र्वेशन साइकल में ISRO ने केवल दो उपकरणों के लिए रिसर्च प्रस्ताव आमंत्रित किए हैं:

  • VELC (Visible Line Emission Coronagraph)सूर्य के कोरोना के अध्ययन के लिए
  • SUIT (Solar Ultraviolet Imaging Telescope)सूर्य की पराबैंगनी छवियों के लिए

ISSDC पोर्टल से होंगे आवेदन

इच्छुक वैज्ञानिक और शोधकर्ता अपने प्रस्ताव Indian Space Science Data Centre (ISSDC) पर उपलब्ध Aditya L1 Proposal Processing System के माध्यम से जमा कर सकते हैं। इन प्रस्तावों का मूल्यांकन Aditya L1 Time Allocation Committee द्वारा वैज्ञानिक गुणवत्ता और तकनीकी व्यवहार्यता के आधार पर किया जाएगा।

डेटा रहेगा सार्वजनिक

ISRO ने स्पष्ट किया है कि मिशन पूरी तरह प्री-प्लान्ड मोड में संचालित होता है, इसलिए शोधकर्ताओं को मिशन ऑपरेशन कॉम्प्लेक्स में मौजूद रहने की अनुमति नहीं होगी
हालाँकि, एक बड़ा और अहम फैसला यह है कि मिशन से प्राप्त डेटा को तुरंत सार्वजनिक डोमेन में जारी किया जाएगा। यह डेटा CDF (Common Data Format) और FITS (Flexible Image Transport System) फॉर्मेट में ISSDC के माध्यम से उपलब्ध होगा।

ISRO ने यह भी बताया कि आदित्य-L1 के डेटा पर आधारित प्रकाशित शोध का उपयोग और संदर्भ एजेंसी अपनी रिपोर्ट्स और प्रकाशनों में कर सकती है।

भारतीय सौर विज्ञान के लिए मील का पत्थर

विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम भारतीय वैज्ञानिक समुदाय के लिए सूर्य, सौर तूफानों और अंतरिक्ष मौसम को समझने की दिशा में एक ऐतिहासिक अवसर है। इससे न केवल भारत की सौर विज्ञान क्षमताएँ मजबूत होंगी, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी भारत की वैज्ञानिक भागीदारी को नई पहचान मिलेगी।

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