वॉशिंगटन: वैश्विक समुद्री शक्ति संतुलन के बीच अमेरिका ने अपनी नौसैनिक क्षमता को और मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। अमेरिकी नौसेना ने भविष्य के युद्धपोतों को परमाणु ऊर्जा से संचालित करने का निर्णय लिया है। इस फैसले को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती सामरिक प्रतिस्पर्धा और लंबी दूरी की सैन्य तैनाती की जरूरतों से जोड़कर देखा जा रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, नए युद्धपोत पारंपरिक डीज़ल या गैस टरबाइन इंजन के बजाय परमाणु रिएक्टर से संचालित होंगे। इससे जहाजों को बार-बार ईंधन भरने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और वे लंबे समय तक समुद्र में सक्रिय रह सकेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु ऊर्जा से चलने वाले युद्धपोत लगातार महीनों तक मिशन पर तैनात रह सकते हैं, जिससे अमेरिका की वैश्विक सैन्य मौजूदगी और मजबूत होगी।
अमेरिकी नौसेना पहले से ही परमाणु ऊर्जा चालित विमानवाहक पोत और पनडुब्बियों का संचालन करती रही है, लेकिन अब इस तकनीक को नए युद्धपोतों तक विस्तार देने की योजना बनाई जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि भविष्य के समुद्री युद्धों में उच्च ऊर्जा क्षमता, उन्नत रडार सिस्टम, लेजर हथियार और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली के लिए अधिक शक्ति की आवश्यकता होगी, जिसे परमाणु ऊर्जा बेहतर तरीके से पूरा कर सकती है।
रणनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम चीन और रूस जैसी समुद्री शक्तियों के बढ़ते प्रभाव के बीच अमेरिका की दीर्घकालिक सैन्य रणनीति का हिस्सा है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती नौसैनिक गतिविधियों ने समुद्री सुरक्षा को वैश्विक राजनीति का अहम मुद्दा बना दिया है।
हालांकि, परमाणु ऊर्जा संचालित युद्धपोतों की लागत पारंपरिक जहाजों की तुलना में अधिक होती है और इनके निर्माण तथा रखरखाव के लिए विशेष तकनीकी ढांचे की आवश्यकता होती है। इसके बावजूद अमेरिकी रक्षा विभाग इसे भविष्य की नौसैनिक युद्ध क्षमता के लिए आवश्यक निवेश मान रहा है।
विश्लेषकों का कहना है कि यह निर्णय आने वाले वर्षों में समुद्री सैन्य प्रतिस्पर्धा को नई दिशा दे सकता है और विश्व की अन्य बड़ी नौसेनाएं भी उन्नत ऊर्जा प्रणालियों की ओर कदम बढ़ा सकती हैं।





