नई दिल्ली। भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) भूषण रामकृष्ण गवई, जिन्होंने 14 मई 2025 को पदभार ग्रहण किया था, 23 नवंबर 2025 तक के अपने निर्धारित कार्यकाल में न्यायपालिका की समावेशिता, पारदर्शिता और संस्थागत स्वतंत्रता को सुदृढ़ करने की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाने के लिए विशेष रूप से चर्चा में रहे। अपेक्षाकृत कम अवधि के बावजूद, उन्होंने कई निर्णायक पहलें की हैं जिन्हें न्यायिक इतिहास के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
गवई की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उच्च न्यायालयों में नियुक्तियों के लिए कुल 129 नामों पर विचार किया, जिनमें से 93 उम्मीदवारों को नियुक्ति के लिए अनुशंसित किया गया। इन नियुक्तियों में 11 उम्मीदवार अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तथा 10 उम्मीदवार अनुसूचित जाति (SC) समुदाय से हैं। यह कदम न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने और समावेशी दृष्टिकोण स्थापित करने की दिशा में एक उल्लेखनीय प्रगति के रूप में देखा जा रहा है।
मुख्य न्यायाधीश गवई ने अपने कार्यकाल के दौरान कॉलेजियम प्रणाली के प्रति स्पष्ट समर्थन दर्ज कराया। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने का महत्वपूर्ण उपकरण है और संवैधानिक ढांचे में इसकी भूमिका अपरिहार्य है। उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर यह भी रेखांकित किया कि सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय दोनों संवैधानिक अधिकार-संपन्न संस्थान हैं, और उन्हें “बड़ी” या “छोटी” अदालत की श्रेणियों में बांटना उचित नहीं है।
न्यायपालिका की प्रतिष्ठा और नैतिक स्वतंत्रता के संदर्भ में गवई ने रिटायरमेंट के बाद जजों द्वारा सरकारी पद स्वीकार करने या राजनीति में प्रवेश करने की प्रवृत्ति पर खुलकर चिंता व्यक्त की। उनके अनुसार ऐसी प्रवृत्तियाँ न्यायालय की स्वायत्तता को प्रभावित कर सकती हैं और आम नागरिकों के न्यायपालिका पर विश्वास को कमजोर कर सकती हैं। उन्होंने नैतिक सीमाओं और संस्थागत आचरण की आवश्यकता पर बल दिया।
अपने कार्यकाल में गवई ने सुप्रीम कोर्ट में तीन नए न्यायाधीशों को शपथ दिलाकर सर्वोच्च न्यायालय की स्वीकृत न्यायाधीश संख्या को पुनः पूर्ण किया। इससे सुनवाई क्षमता में वृद्धि हुई और लंबित मामलों के निस्तारण की प्रक्रिया को गति मिलने की उम्मीद व्यक्त की गई।
संवैधानिक मुद्दों के संदर्भ में भी गवई सक्रिय और स्पष्ट दृष्टिकोण के साथ सामने आए। विशेष रूप से SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत अग्रिम ज़मानत के विषय पर उन्होंने न्यायिक व्याख्या के माध्यम से संवेदनशीलता और संवैधानिक संतुलन का संदेश दिया। सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों से जुड़े मामलों में उनकी टिप्पणियाँ न्यायिक प्रणाली को नागरिकों के अधिकारों के और निकट लाने के प्रयास के रूप में देखी गईं।
गवई का कार्यकाल समय की दृष्टि से संक्षिप्त होने के कारण दीर्घकालीन संरचनात्मक सुधारों की सीमाएँ स्वाभाविक रूप से बनी रहीं। इसके बावजूद न्यायिक नियुक्तियों में सामाजिक समावेश, कॉलेजियम प्रणाली के संरक्षण, न्यायपालिका की नैतिकता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा पर उनका योगदान उल्लेखनीय माना जा रहा है। उनके कार्यकाल के प्रभाव और निरंतरता का आकलन आने वाले समय में अधिक स्पष्ट रूप से सामने आएगा।





