मुंबई/नई दिल्ली। महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर शिवसेना के दोनों धड़ों के संभावित पुनर्मिलन को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं के एक वर्ग ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को चुनौती देने के लिए उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुट को साथ आने की अपील की है। इस घटनाक्रम ने राज्य की सियासत में नई हलचल पैदा कर दी है।
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, हाल के चुनावी परिणामों और बदलते समीकरणों के बाद दोनों गुटों में यह भावना उभर रही है कि अलग-अलग लड़ने से शिवसेना की पारंपरिक ताकत कमजोर हुई है। कई नेताओं का मानना है कि भाजपा के बढ़ते वर्चस्व के सामने शिवसैनिकों की एकजुटता पार्टी के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
बताया जा रहा है कि शिवसेना के कुछ वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं ने दोनों पक्षों के बीच संवाद की जरूरत पर जोर दिया है। उनका तर्क है कि बालासाहेब ठाकरे की विरासत को मजबूत बनाए रखने के लिए संगठनात्मक एकता आवश्यक है। वहीं, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि दोनों धड़े साथ आते हैं तो महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
हालांकि, इस बीच महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने विलय की अटकलों को ज्यादा महत्व नहीं दिया। उन्होंने कहा कि उनका गुट ही बालासाहेब ठाकरे की विचारधारा का वास्तविक वाहक है और इसी रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। शिंदे के बयान से यह संकेत मिला है कि फिलहाल दोनों गुटों के बीच दूरी पूरी तरह खत्म होती नहीं दिख रही।
गौरतलब है कि वर्ष 2022 में शिवसेना में हुई बड़ी टूट के बाद पार्टी दो हिस्सों में बंट गई थी। इसके बाद से दोनों गुट अलग-अलग राजनीतिक रास्तों पर चलते रहे हैं। बावजूद इसके, समय-समय पर दोनों पक्षों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की ओर से एकता की मांग उठती रही है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि आगामी स्थानीय निकाय और अन्य चुनावों को देखते हुए शिवसेना के दोनों धड़ों के रिश्तों पर सबकी नजर बनी हुई है। यदि एकता की दिशा में कोई ठोस कदम उठता है तो इसका असर केवल शिवसेना ही नहीं, बल्कि पूरे महाराष्ट्र के राजनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है।





