नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी (AAP) के भीतर चल रहा अंदरूनी घमासान एक बार फिर सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक चर्चा का विषय बन गया है। इस बार विवाद के केंद्र में पार्टी के सबसे चर्चित चेहरों में से एक और राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा हैं। उनके हालिया बयानों और सोशल मीडिया पर साझा किए गए संदेशों ने राजनीतिक गलियारों में इस बात की अटकलें तेज कर दी हैं कि क्या वे भी पार्टी के उन दिग्गजों की सूची में शामिल होने जा रहे हैं, जिन्होंने समय-समय पर पार्टी से बगावत कर अपना रास्ता अलग कर लिया।
राघव चड्ढा की ‘खामोशी’ और ‘सैलाब’ के संकेत
राघव चड्ढा ने सीधे तौर पर पार्टी नेतृत्व के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया है, लेकिन उनके द्वारा साझा किए गए एक वीडियो संदेश ने ‘इशारों-इशारों’ में बहुत कुछ कह दिया है। उन्होंने शायराना अंदाज में चेतावनी देते हुए कहा:
“मेरी खामोशी को मेरी हार मत समझ लेना, मैं वो दरिया हूं जो वक्त आने पर सैलाब बनता है।”
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान पार्टी के भीतर उनकी उपेक्षा किए जाने के प्रति एक कड़ा प्रतिरोध है। गौरतलब है कि जब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जेल में थे, तब राघव चड्ढा की गैर-मौजूदगी और हाल के दिनों में पंजाब की राजनीति से उनकी दूरी ने पार्टी और उनके बीच की खाई को उजागर कर दिया था। हालांकि, संजय सिंह जैसे वरिष्ठ नेता इसे केवल ‘संगठनात्मक बदलाव’ बता रहे हैं।
इतिहास के पन्ने: जब बड़े नामों ने छोड़ा ‘झाड़ू’ का साथ
आम आदमी पार्टी के गठन से लेकर अब तक कई ऐसे कद्दावर नेता रहे हैं, जिन्होंने पार्टी की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाते हुए किनारा कर लिया। आइए नजर डालते हैं उन बड़े नामों पर:
| नेता का नाम | अलग होने का मुख्य कारण |
| प्रशांत भूषण | पार्टी के व्यक्ति-केंद्रित होने और आंतरिक लोकतंत्र की कमी का आरोप लगाया। |
| योगेंद्र यादव | पार्टी के मूल सिद्धांतों से भटकने और पारंपरिक राजनीति अपनाने की बात कही। |
| कुमार विश्वास | नेतृत्व द्वारा किनारे किए जाने और गलत फैसलों का विरोध करने पर तकरार। |
| शाजिया इल्मी | आंतरिक लोकतंत्र की कमी और पारदर्शिता के मुद्दों पर 2015 में इस्तीफा दिया। |
| कपिल मिश्रा | नेतृत्व पर सीधे भ्रष्टाचार के आरोप लगाए, जिसके बाद उन्हें निष्कासित किया गया। |
| स्वाति मालीवाल | पार्टी के ही एक पदाधिकारी पर गंभीर आरोप लगाए, जिससे पार्टी की काफी किरकिरी हुई। |
राघव की दलील और विपक्ष का वार
राघव चड्ढा ने अपने पक्ष में तर्क दिया है कि वे संसद में लगातार महंगाई, बैंक शुल्क और टेलीकॉम नीतियों जैसे जनहित के मुद्दे उठा रहे हैं। उन्होंने सवाल किया कि जनता की आवाज उठाना पार्टी विरोधी कैसे हो सकता है?
दूसरी ओर, इस पूरे घटनाक्रम ने विपक्ष को हमलावर होने का मौका दे दिया है। विपक्षी दलों का कहना है कि ‘आप’ के भीतर असंतोष का ज्वालामुखी फटने को तैयार है और यह पार्टी की एकता के लिए शुभ संकेत नहीं है।





