नई दिल्ली। परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े विधेयकों को लेकर देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी की रणनीति से विपक्षी दलों के बीच मतभेद उभरने की आशंका जताई जा रही है। कांग्रेस को चिंता है कि सरकार क्षेत्रीय दलों से अलग-अलग बातचीत कर विपक्षी एकता को कमजोर कर सकती है। इससे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के खिलाफ बने संयुक्त विपक्षी मोर्चे पर भी असर पड़ सकता है।
दरअसल, केंद्र सरकार ने अप्रैल 2026 में महिला आरक्षण और लोकसभा की सीटें बढ़ाकर 850 करने से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक पेश किया था। हालांकि, लोकसभा में इसे आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका। विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े, जबकि इसे पारित कराने के लिए 352 वोटों की जरूरत थी।
खरगे ने सर्वदलीय बैठक की मांग दोहराई
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 16 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर परिसीमन और महिला आरक्षण के मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग दोहराई। कांग्रेस का कहना है कि परिसीमन जैसे संवेदनशील संवैधानिक विषय पर सभी राजनीतिक दलों से चर्चा और राज्यों के प्रतिनिधित्व को लेकर स्पष्टता जरूरी है।
खरगे इससे पहले भी सरकार को पत्र लिखकर इस विषय पर व्यापक विचार-विमर्श की मांग कर चुके हैं। कांग्रेस को आशंका है कि सरकार संसद का संक्षिप्त सत्र बुलाकर विधेयक को दोबारा पारित कराने की कोशिश कर सकती है।
रिजिजू ने कांग्रेस पर लगाया सहयोग नहीं करने का आरोप
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार ने व्यापक सहमति बनाने के लिए कई क्षेत्रीय दलों से बातचीत की है। उनके अनुसार, कांग्रेस के साथ चर्चा के प्रयासों के बावजूद सहमति नहीं बन पाई।
सरकार का पक्ष है कि परिसीमन पर सभी दलों की चिंताओं को समझना और महिला आरक्षण को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ना जरूरी है। वहीं, कांग्रेस का कहना है कि अलग-अलग दलों से बातचीत करने के बजाय सरकार को सभी पक्षों के साथ साझा मंच पर चर्चा करनी चाहिए।
क्षेत्रीय दलों के रुख पर टिकी नजरें
एसआईआर के मुद्दे पर कांग्रेस के साथ कई विपक्षी दल एकजुट दिखाई दिए हैं, लेकिन परिसीमन पर उनके रुख में अंतर आने की संभावना है। क्षेत्रीय दलों के लिए महिला आरक्षण का समर्थन और अपने राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की सुरक्षा, दोनों महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।
भाजपा की रणनीति से विपक्षी दलों के बीच सहमति बनती है या मतभेद बढ़ते हैं, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। फिलहाल परिसीमन का मुद्दा केवल संवैधानिक बदलाव तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि विपक्षी एकता और देश की आगामी राजनीतिक दिशा के लिहाज से भी अहम बन गया है।





