नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर आज देश के सबसे प्रमुख प्रदर्शन स्थलों में शुमार है। छात्र आंदोलन, सामाजिक संगठनों के धरने और विभिन्न राजनीतिक प्रदर्शनों का केंद्र बन चुके इस ऐतिहासिक स्थल की पहचान कभी एक अत्याधुनिक खगोलीय वेधशाला के रूप में थी। हाल के दिनों में यहां चल रहे आंदोलनों के बीच जंतर-मंतर का इतिहास एक बार फिर चर्चा में हजंतर-मंतर का निर्माण वर्ष 1724 में जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने कराया था। इसका उद्देश्य सूर्य, चंद्रमा और ग्रहों की गति का अध्ययन करना, समय की सटीक गणना करना तथा खगोलीय आंकड़े तैयार करना था। यहां स्थापित विशाल पत्थर के यंत्र उस दौर की वैज्ञानिक सोच और वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण माने जाते हैं।
समय के साथ जंतर-मंतर का महत्व केवल ऐतिहासिक और वैज्ञानिक स्थल तक सीमित नहीं रहा। संसद मार्ग के निकट स्थित होने और प्रशासनिक दृष्टि से उपयुक्त स्थान होने के कारण यह धीरे-धीरे शांतिपूर्ण प्रदर्शनों और जन आंदोलनों का प्रमुख केंद्र बन गया। विभिन्न सामाजिक संगठनों, कर्मचारी संघों, किसानों, छात्रों और राजनीतिक दलों ने वर्षों से अपनी मांगों को लेकर यहां धरना-प्रदर्शन किए हैं।
सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के बाद जंतर-मंतर को नियंत्रित एवं निर्धारित प्रदर्शन स्थल के रूप में विकसित किया गया। इसके चलते यह लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया है, जहां देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग अपनी मांगों और मुद्दों को लेकर पहुंचते हैं।
इन दिनों भी जंतर-मंतर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में है, जहां विभिन्न संगठनों के प्रदर्शन जारी हैं। सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और प्रशासन लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है। ऐतिहासिक विरासत और लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का अनूठा संगम बना जंतर-मंतर आज भी देश की सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है।





