नई दिल्ली। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने कानून के क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के बढ़ते उपयोग पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि एआई एक उपयोगी सहायक उपकरण हो सकता है, लेकिन कानूनी ड्राफ्टिंग और न्यायिक कार्य में उस पर अत्यधिक निर्भरता उचित नहीं है। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया पर लोकप्रियता को कभी भी विश्वसनीयता का पर्याय नहीं माना जाना चाहिए।
नवनियुक्त एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड (एओआर) को संबोधित करते हुए सीजेआई ने कहा कि एक सफल वकील की पहचान उसकी तैयारी, मेहनत, नैतिकता और अदालत में प्रस्तुत किए गए कार्य की गुणवत्ता से होती है, न कि सोशल मीडिया पर उसके फॉलोअर्स या प्रचार से। उन्होंने युवा अधिवक्ताओं से जल्द प्रसिद्धि पाने की बजाय मजबूत पेशेवर प्रतिष्ठा बनाने पर ध्यान देने का आह्वान किया।
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि एआई शोध और प्रारंभिक मसौदा तैयार करने में सहायक हो सकता है, लेकिन यह मानवीय विवेक, कानूनी समझ और संवेदनशीलता का विकल्प नहीं बन सकता। किसी भी मुकदमे की वास्तविक परिस्थितियों, मुवक्किल की भावनाओं और तथ्यों की गहराई को समझने का कार्य केवल इंसान ही प्रभावी ढंग से कर सकता है। इसलिए अंतिम ड्राफ्ट तैयार करते समय वकीलों को अपनी स्वतंत्र कानूनी सोच और विश्लेषण का उपयोग करना चाहिए।
उन्होंने अपने शुरुआती पेशेवर जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि वरिष्ठ अधिवक्ताओं के लिए ड्राफ्ट तैयार करने के अनुभव ने उनकी कानूनी समझ को मजबूत किया। इसी अनुभव ने उन्हें सिखाया कि प्रभावी ड्राफ्टिंग केवल भाषा का कौशल नहीं, बल्कि तथ्यों को न्यायालय के सामने तार्किक और विश्वसनीय ढंग से प्रस्तुत करने की कला भी है।
सीजेआई ने कहा कि न्याय व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य आम नागरिक, विशेषकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को सुलभ और प्रभावी न्याय उपलब्ध कराना है। उन्होंने युवा वकीलों से आग्रह किया कि वे तकनीक का उपयोग करें, लेकिन अपनी विश्वसनीयता, पेशेवर ईमानदारी और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।




