संयुक्त राष्ट्र: संयुक्त राष्ट्र (UN) की एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि तेजी से बढ़ते आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) डेटा सेंटर्स दुनिया में पानी और ऊर्जा संकट को और गंभीर बना सकते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि डिजिटल तकनीक की बढ़ती मांग के साथ डेटा प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार पर्यावरणीय दबाव बढ़ा रहा है।
UN विशेषज्ञों के अनुसार, बड़े AI मॉडल और क्लाउड कंप्यूटिंग सिस्टम को चलाने के लिए भारी मात्रा में बिजली और पानी की आवश्यकता होती है, खासकर कूलिंग सिस्टम के लिए। इससे कई क्षेत्रों में जल संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है और ऊर्जा खपत भी तेजी से बढ़ रही है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यदि इसी गति से डेटा सेंटर्स का विस्तार होता रहा तो आने वाले वर्षों में कई देशों को बिजली आपूर्ति और जल प्रबंधन में गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। विशेष रूप से वे देश जहां पहले से ही जल संकट या ऊर्जा की कमी है, वहां स्थिति और बिगड़ सकती है।
संयुक्त राष्ट्र ने सुझाव दिया है कि तकनीकी कंपनियों को अधिक ऊर्जा-कुशल और पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों को अपनाना चाहिए। साथ ही, नवीकरणीय ऊर्जा (renewable energy) के उपयोग को बढ़ावा देने की भी सिफारिश की गई है ताकि पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को कम किया जा सके।
रिपोर्ट में नीति-निर्माताओं से भी अपील की गई है कि वे डेटा सेंटर निर्माण और संचालन के लिए सख्त पर्यावरणीय मानक लागू करें। इससे तकनीकी विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाया जा सकेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि AI और डिजिटल अर्थव्यवस्था भविष्य की जरूरत है, लेकिन इसके साथ सतत विकास (sustainable development) को प्राथमिकता देना बेहद जरूरी है।
कुल मिलाकर, UN की यह रिपोर्ट एक स्पष्ट संदेश देती है कि तकनीकी प्रगति के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, अन्यथा इसका असर वैश्विक स्तर पर महसूस किया जाएगा।
अमेरिका पहले भी मानवाधिकार और श्रम मानकों को लेकर विभिन्न देशों पर व्यापारिक प्रतिबंध और टैरिफ लगाने की नीति अपनाता रहा है। इस नए प्रस्ताव को भी उसी नीति के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है।
कुल मिलाकर, यह प्रस्ताव वैश्विक व्यापार संबंधों में एक नया तनाव पैदा कर सकता है और आने वाले समय में इस पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होगी।





