काठमांडू: नेपाल के गृह मंत्री सुदन गुरुंग ने अपने पद से अचानक इस्तीफा देकर देश के राजनीतिक गलियारों में सनसनी फैला दी है। पिछले कुछ समय से विवादों और राजनीतिक दबाव का सामना कर रहे गुरुंग ने बुधवार को अपना त्यागपत्र प्रधानमंत्री को सौंप दिया। इस्तीफा देने के बाद मीडिया से बात करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके लिए राजनीतिक पद की तुलना में नैतिकता और व्यक्तिगत शुचिता का महत्व कहीं अधिक है। उनके इस फैसले ने नेपाल की सत्ताधारी गठबंधन सरकार के भीतर भी हलचल तेज कर दी है।
इस्तीफे के पीछे का मुख्य कारण: ‘नैतिकता का तकाजा’
सुदन गुरुंग का कार्यकाल पिछले कुछ हफ्तों से विभिन्न आरोपों और प्रशासनिक चुनौतियों के कारण चर्चा में था।
- नैतिक आधार: अपने संबोधन में गुरुंग ने कहा, “जब तक आप सार्वजनिक पद पर हैं, आपको जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए मुझे लगा कि मेरा पद पर बने रहना नैतिक रूप से सही नहीं है।”
- विवादों का साया: हालांकि उन्होंने किसी विशिष्ट घटना का नाम नहीं लिया, लेकिन माना जा रहा है कि मंत्रालय के कामकाज को लेकर विपक्ष के बढ़ते हमलों और गठबंधन के भीतर बढ़ते असंतोष ने उन्हें इस फैसले के लिए मजबूर किया है।
विपक्ष का दबाव और आंतरिक कलह
नेपाल की संसद में विपक्षी दल लगातार गृह मंत्री के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे।
- जांच की मांग: उन पर कुछ प्रशासनिक फैसलों में पारदर्शिता की कमी और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों को लेकर उंगलियां उठाई जा रही थीं।
- सरकार की छवि: सूत्रों का कहना है कि सरकार की गिरती छवि को बचाने के लिए भी यह कदम उठाया गया है, ताकि आगामी सत्रों में प्रधानमंत्री को विपक्ष के कड़े सवालों का सामना न करना पड़े।
प्रधानमंत्री और गठबंधन पर असर
गृह मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद का खाली होना नेपाल की मौजूदा सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
- नया उत्तराधिकारी: अब प्रधानमंत्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसे चेहरे को गृह मंत्रालय सौंपने की है जो न केवल प्रशासनिक रूप से सक्षम हो, बल्कि गठबंधन के सभी दलों को स्वीकार्य भी हो।
- सत्ता का संतुलन: सुदन गुरुंग के इस्तीफे के बाद गठबंधन के भीतर शक्ति संतुलन बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है, क्योंकि गृह मंत्रालय देश की आंतरिक सुरक्षा और प्रशासन का केंद्र होता है।
गुरुंग का राजनीतिक भविष्य
सुदन गुरुंग ने यह साफ कर दिया है कि वे भले ही मंत्री पद छोड़ रहे हैं, लेकिन राजनीति और सामाजिक कार्यों में सक्रिय बने रहेंगे। उन्होंने अपने समर्थकों को आश्वस्त किया कि वे पार्टी के भीतर रहकर लोकतंत्र को मजबूत करने का काम जारी रखेंगे। उनके समर्थकों ने इस कदम को एक ‘बहादुरी भरा फैसला’ बताया है, जबकि आलोचक इसे दबाव में उठाया गया कदम मान रहे हैं।




