नई दिल्ली: संसद के उच्च सदन राज्यसभा में उपसभापति पद के लिए शुक्रवार को होने वाले चुनाव की तस्वीर लगभग साफ हो गई है। सत्तारूढ़ गठबंधन की ओर से नामित सदस्य हरिवंश का इस पद पर दोबारा आसीन होना अब महज एक औपचारिकता रह गया है। जहाँ सत्ता पक्ष ने उनके समर्थन में पांच प्रस्तावों के नोटिस दाखिल किए हैं, वहीं विपक्ष ने इस पूरी प्रक्रिया से दूरी बनाने का निर्णय लेते हुए चुनाव के बहिष्कार का एलान कर दिया है।
हैट्रिक की ओर हरिवंश: निर्विरोध निर्वाचन के आसार
राज्यसभा सचिवालय को अब तक प्राप्त जानकारी के अनुसार, उपसभापति पद के लिए केवल हरिवंश के पक्ष में ही नामांकन और प्रस्ताव मिले हैं। विपक्ष की ओर से किसी भी उम्मीदवार का नाम सामने न आने के कारण उनका निर्विरोध चुना जाना तय माना जा रहा है।
- ऐतिहासिक कार्यकाल: यदि हरिवंश निर्वाचित होते हैं, तो यह उनका लगातार तीसरा कार्यकाल होगा।
- रिक्त पद की पृष्ठभूमि: ज्ञात हो कि 9 अप्रैल को उनका पिछला कार्यकाल समाप्त होने के बाद यह पद रिक्त हो गया था, जिसके बाद उन्हें राष्ट्रपति द्वारा पुनः राज्यसभा के लिए नामित किया गया था।
विपक्ष का कड़ा रुख: बहिष्कार के पीछे तीन मुख्य कारण
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और जयराम रमेश ने स्पष्ट किया है कि विपक्षी दल इस चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनेंगे। उन्होंने सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए बहिष्कार के तीन प्रमुख कारण गिनाए हैं:
- लोकसभा उपाध्यक्ष का पद: विपक्ष का आरोप है कि पिछले सात वर्षों से लोकसभा में उपाध्यक्ष (Deputy Speaker) की नियुक्ति नहीं की गई है, जो संसदीय परंपराओं का सीधा उल्लंघन है।
- असामान्य पुनर्नॉमिनेशन: जयराम रमेश ने कहा कि हरिवंश का कार्यकाल खत्म होने के ठीक अगले दिन उन्हें फिर से नामित करना और तुरंत उपसभापति पद का उम्मीदवार बनाना एक ‘असामान्य’ प्रक्रिया है।
- संवाद का अभाव: विपक्ष का दावा है कि इस महत्वपूर्ण संवैधानिक पद के चुनाव को लेकर सरकार ने विपक्षी दलों के साथ कोई सार्थक चर्चा या आम सहमति बनाने का प्रयास नहीं किया।
“विरोध व्यक्तिगत नहीं, नीतिगत है”
विपक्ष ने स्पष्ट किया है कि उनका यह विरोध हरिवंश के व्यक्तित्व के खिलाफ नहीं, बल्कि सरकार की कार्यशैली के विरुद्ध है। जयराम रमेश ने हरिवंश के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए कहा कि उनका विरोध लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए है। विपक्ष ने यह उम्मीद भी जताई कि यदि हरिवंश पुनः कार्यभार संभालते हैं, तो वह भविष्य में सदन के भीतर विपक्ष की आवाज को अधिक गंभीरता और निष्पक्षता के साथ सुनेंगे।





