नई दिल्ली/बेंगलुरु: नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) और साइबर सेल की संयुक्त टीम ने देश के सबसे बड़े और आधुनिक डार्कनेट ड्रग नेटवर्क ‘टीम कल्कि’ (Team Kalki) का भंडाफोड़ किया है। यह सिंडिकेट गुप्त डिजिटल प्लेटफॉर्म और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स के जरिए देशभर में प्रतिबंधित नशीले पदार्थों की तस्करी कर रहा था। जांच में खुलासा हुआ है कि इस गिरोह ने पिछले कुछ महीनों में भारत के विभिन्न राज्यों में 1,000 से अधिक पार्सल डिलीवर किए हैं।
कैसे काम करता था ‘टीम कल्कि’ नेटवर्क? जांच अधिकारियों के अनुसार, यह गिरोह पारंपरिक ड्रग तस्करी के बजाय पूरी तरह डिजिटल और ‘कॉन्टैक्टलेस’ मॉडल पर काम कर रहा था:
- डार्क वेब का सहारा: नशीली दवाओं के ऑर्डर डार्कनेट पर बने गुप्त स्टोरफ्रंट के जरिए लिए जाते थे, जिन्हें सामान्य ब्राउज़र से एक्सेस नहीं किया जा सकता।
- क्रिप्टोकरेंसी में भुगतान: लेनदेन के लिए बिटकॉइन और मोनेरो जैसी क्रिप्टोकरेंसी का उपयोग किया जाता था, ताकि पैसों के लेन-देन का पता लगाना मुश्किल हो सके।
- पार्सल की कोडिंग: ड्रग्स को कॉस्मेटिक्स, खिलौनों और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के डिब्बों में छिपाकर कूरियर सेवाओं के माध्यम से भेजा जाता था।
देशव्यापी छापेमारी और गिरफ्तारियां एनसीबी ने एक गुप्त सूचना के आधार पर ‘ऑपरेशन कवच’ के तहत दिल्ली, बेंगलुरु, मुंबई और हैदराबाद में एक साथ छापेमारी की:
- मास्टरमाइंड गिरफ्तार: गिरोह के मुख्य संचालक सहित 5 टेक-सैवी युवाओं को गिरफ्तार किया गया है, जो कथित तौर पर विदेशों से एलएसडी (LSD) ब्लॉट, एमडीएमए (MDMA) और सिंथेटिक मारिजुआना मंगवाते थे।
- भारी बरामदगी: छापेमारी के दौरान करोड़ों रुपये की अंतरराष्ट्रीय कीमत वाली सिंथेटिक ड्रग्स, हार्ड ड्राइव, क्रिप्टो वॉलेट और फर्जी पतों वाले कूरियर रसीदें बरामद की गई हैं।
- कूरियर कंपनियों की भूमिका: जांच के दायरे में कई निजी कूरियर कंपनियां भी हैं, जिनके माध्यम से ये 1,000 पार्सल देश के कोने-कोने में भेजे गए।
युवाओं और छात्रों को बनाया जा रहा था निशाना एनसीबी के महानिदेशक के अनुसार, ‘टीम कल्कि’ मुख्य रूप से कॉलेज जाने वाले छात्रों और आईटी प्रोफेशनल्स को अपना शिकार बना रही थी।
- सोशल मीडिया मार्केटिंग: टेलीग्राम और सिग्नल जैसे ऐप्स पर बने ग्रुप्स के जरिए ड्रग्स की ‘मेनू कार्ड’ शेयर की जाती थी।
होम डिलीवरी: गिरोह ने एक ऐसी व्यवस्था बना ली थी जिसमें ग्राहक को ड्रग पेडलर से मिलने की जरूरत नहीं होती थी, सीधे घर के पते पर पार्सल पहुँच जाता था।





