Monday, February 9, 2026

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‘अधिकारियों के नाम भेजने में देरी क्यों?’: SIR पर सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार को लगाई फटकार; सख्त लहजे में पूछे कई तीखे सवाल

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में ‘सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट’ (SIR) के लिए अधिकारियों की नियुक्ति में हो रही देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर असंतोष व्यक्त करते हुए पूछा है कि आखिर अधिकारियों के नाम भेजने में इतनी लंबी देरी क्यों की जा रही है? न्यायमूर्ति की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान बंगाल सरकार के वकीलों से कई तीखे सवाल पूछे और स्पष्ट किया कि प्रशासनिक सुस्ती के कारण महत्वपूर्ण परियोजनाओं और सामाजिक आकलन की प्रक्रियाओं को अनिश्चित काल के लिए नहीं रोका जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियाँ: क्या है पूरा मामला?

अदालत ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की दलीलों को अपर्याप्त पाते हुए निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा:

  • प्रक्रिया में बाधा: कोर्ट ने कहा कि जब अधिकारियों की नियुक्ति के लिए स्पष्ट निर्देश दिए गए थे, तो फाइलें महीनों तक क्यों दबी रहीं?
  • जवाबदेही तय हो: पीठ ने पूछा कि क्या अधिकारियों के नाम तय करने में कोई राजनीतिक या प्रशासनिक अड़चन है, या यह केवल कार्यप्रणाली की सुस्ती का परिणाम है?
  • समय सीमा का उल्लंघन: सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जताई कि बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद राज्य सरकार ने अब तक योग्य अधिकारियों की सूची (Panel) प्रस्तुत नहीं की है।

SIR (सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट) का महत्व

सामाजिक प्रभाव आकलन (SIR) किसी भी बड़ी विकास परियोजना या भूमि अधिग्रहण से पहले की जाने वाली एक अनिवार्य प्रक्रिया है:

  1. विस्थापितों के हित: इसके माध्यम से यह जांचा जाता है कि किसी प्रोजेक्ट से स्थानीय लोगों के जीवन, आजीविका और पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
  2. कानूनी अनिवार्यता: बिना उचित SIR रिपोर्ट के, भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को कानूनी रूप से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
  3. पारदर्शिता: निष्पक्ष अधिकारियों की नियुक्ति यह सुनिश्चित करती है कि रिपोर्ट में जनता के हितों की अनदेखी न हो।

बंगाल सरकार का पक्ष और भविष्य की कार्रवाई

राज्य सरकार के प्रतिनिधियों ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि प्रक्रिया अंतिम चरण में है और जल्द ही नामों की सूची सौंप दी जाएगी। हालांकि, कोर्ट ने इस आश्वासन को ‘काफी नहीं’ बताते हुए अगली सुनवाई तक हलफनामा (Affidavit) दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने चेतावनी दी है कि यदि अगली तारीख तक नाम नहीं भेजे गए, तो कोर्ट इस मामले में कड़े आदेश पारित करने के लिए मजबूर होगा।

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