नैनीताल: सरोवर नगरी नैनीताल में इस साल प्रकृति का एक अजीबोगरीब चक्र देखने को मिल रहा है। जिस फरवरी के महीने में यहां कड़ाके की ठंड और बर्फबारी हुआ करती थी, वहां अब मई जैसी गर्मी का अहसास हो रहा है। मौसम वैज्ञानिकों ने इस असामान्य बदलाव के पीछे ‘अल नीनो’ (El Niño) के प्रभाव को मुख्य कारण बताया है। दिन के समय चटख धूप खिलने से अधिकतम तापमान सामान्य से कई डिग्री ऊपर पहुंच गया है। हालांकि, मौसम के इस ‘हॉट’ मिजाज ने नैनीताल के पर्यटन कारोबार को नई संजीवनी दे दी है, जिससे व्यापारियों के चेहरे खिल उठे हैं।
फरवरी में गर्मी का रिकॉर्ड: क्या कहते हैं आंकड़े?
नैनीताल और आसपास के इलाकों में इस बार ठंड का असर बेहद कम रहा है:
- तापमान में वृद्धि: दिन का तापमान फरवरी के शुरुआती दिनों में ही 18°C से 22°C के बीच दर्ज किया जा रहा है, जो आमतौर पर मार्च के अंत या अप्रैल में देखा जाता है।
- सूखा स्पैल: शीतकालीन वर्षा और बर्फबारी की कमी के कारण पहाड़ों की नमी कम हो गई है, जिससे शुष्क गर्मी (Dry Heat) का अहसास बढ़ गया है।
- अल नीनो का साया: विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशांत महासागर में अल नीनो की सक्रियता के कारण वैश्विक स्तर पर तापमान बढ़ रहा है, जिसका सीधा असर उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों पर पड़ रहा है।
पर्यटन में भारी उछाल: मैदानों से पहाड़ों की ओर दौड़
फरवरी में मई जैसी धूप खिलने का सबसे सकारात्मक असर नैनीताल के पर्यटन पर पड़ा है:
- वीकेंड पर उमड़ी भीड़: मैदानी इलाकों में बढ़ रही गर्मी और पहाड़ों में खुशनुमा धूप का आनंद लेने के लिए दिल्ली, यूपी और हरियाणा से भारी संख्या में पर्यटक नैनीताल पहुंच रहे हैं।
- होटल ऑक्यूपेंसी में इजाफा: आमतौर पर फरवरी को ‘लीन सीजन’ (सुस्त समय) माना जाता है, लेकिन इस बार होटलों और होम-स्टे में 70 से 80 फीसदी तक बुकिंग चल रही है।
- नौकायन और माल रोड: नैनी झील में नौकायन करने वाले पर्यटकों की संख्या में अचानक बढ़ोतरी हुई है और शाम के समय माल रोड पर सैलानियों की खासी चहल-पहल देखी जा रही है।
पर्यावरण और खेती के लिए खतरे की घंटी
हालांकि पर्यटन के लिए यह अच्छा है, लेकिन पर्यावरणविद् इसे खतरे के संकेत के रूप में देख रहे हैं:
- ग्लेशियरों पर असर: समय से पहले गर्मी बढ़ने से ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में बर्फ जल्दी पिघल सकती है, जो जल स्रोतों के लिए भविष्य में संकट पैदा कर सकता है।
- फलों की पैदावार: सेब और आड़ू जैसे फलों के लिए जरूरी ‘चिलिंग आवर्स’ (ठंड के घंटे) पूरे नहीं होने से इस साल फलों की पैदावार पर बुरा असर पड़ सकता है।
- जंगलों में आग (Forest Fires): गर्मी और शुष्कता के कारण उत्तराखंड के जंगलों में समय से पहले ही आग लगने की घटनाएं शुरू होने का अंदेशा बढ़ गया है।





