Friday, February 6, 2026

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‘सनातन संस्कृति और राष्ट्र एक-दूसरे के पूरक, इनके बिना भारत की कल्पना असंभव’: हरिद्वार में गरजे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह; राष्ट्रवाद और आध्यात्मिकता के मेल पर दिया जोर

हरिद्वार: केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आज धर्मनगरी हरिद्वार के एक प्रतिष्ठित आध्यात्मिक समागम में शिरकत करते हुए ‘सनातन संस्कृति’ और ‘राष्ट्रवाद’ के गहरे अंतर्संबंधों पर अपने विचार साझा किए। रक्षा मंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सनातन संस्कृति और भारतीय राष्ट्र एक-दूसरे के पूरक हैं और इन्हें एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की पहचान उसकी भौगोलिक सीमाओं से कहीं अधिक उसकी सांस्कृतिक विरासत में निहित है, जिसने सदियों से देश को एक सूत्र में पिरोकर रखा है।

सनातन ही भारत की आत्मा: रक्षा मंत्री के संबोधन के प्रमुख अंश

राजनाथ सिंह ने आध्यात्मिकता और आधुनिक राष्ट्र के बीच के संतुलन को रेखांकित करते हुए कई महत्वपूर्ण बिंदु रखे:

  • सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: उन्होंने कहा कि भारत केवल एक राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक विचार है। सनातन संस्कृति वह आधारशिला है जिस पर ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ का भव्य भवन खड़ा है।
  • विश्व बंधुत्व का संदेश: रक्षा मंत्री ने याद दिलाया कि ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (पूरी दुनिया एक परिवार है) का विचार सनातन संस्कृति ने ही विश्व को दिया है, जो आज के वैश्विक संघर्षों के दौर में सबसे सटीक समाधान है।
  • समावेशी विचारधारा: उन्होंने स्पष्ट किया कि सनातन कभी संकुचित नहीं रहा; इसने हमेशा हर विचार का सम्मान किया है और इसी लचीलेपन ने भारत को हर आक्रमण के बावजूद जीवित रखा है।

सुरक्षा और संस्कृति का मेल: सीमाओं की रक्षा के साथ संस्कारों की रक्षा

रक्षा मंत्री ने सीमाओं पर तैनात जवानों और देश के भीतर सक्रिय ऋषियों के योगदान की तुलना की:

  1. दो रक्षक: उन्होंने कहा कि जहां हमारे सैनिक हथियारों के साथ सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं, वहीं हमारे संत और विद्वान अपनी तपस्या से राष्ट्र के चरित्र और संस्कारों की रक्षा कर रहे हैं।
  2. आत्मनिर्भरता का आधार: राजनाथ सिंह के अनुसार, जब तक कोई राष्ट्र अपनी जड़ों और अपनी संस्कृति पर गर्व नहीं करता, तब तक वह सही मायने में ‘आत्मनिर्भर’ नहीं बन सकता।
  3. युवाओं को आह्वान: उन्होंने आधुनिक पीढ़ी से अपील की कि वे अपनी जड़ों से जुड़े रहें और विकास के साथ-साथ अपनी विरासत का भी संरक्षण करें।

हरिद्वार में संतों का सानिध्य

पतंजलि योगपीठ या अन्य किसी प्रमुख आश्रम (संदर्भ के अनुसार) में आयोजित कार्यक्रम के दौरान रक्षा मंत्री ने कई प्रमुख संतों से आशीर्वाद लिया। उन्होंने कहा कि हरिद्वार जैसी पवित्र भूमि से निकलने वाली ऊर्जा पूरे देश को मार्ग दिखाती है। इस दौरान मुख्यमंत्री और अन्य गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित रहे, जिन्होंने रक्षा क्षेत्र में भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता की सराहना की।

निष्कर्ष: विकसित भारत के लिए सांस्कृतिक चेतना अनिवार्य

रक्षा मंत्री ने अपने भाषण का समापन करते हुए कहा कि 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प केवल आर्थिक प्रगति से पूरा नहीं होगा, बल्कि इसके लिए एक मजबूत सांस्कृतिक चेतना भी अनिवार्य है। उन्होंने विश्वास जताया कि सनातन के शाश्वत मूल्य भारत को विश्व गुरु के पद पर पुनः आसीन करेंगे।

“भारत की सीमाओं की रक्षा की जिम्मेदारी हमारी सेना की है, लेकिन भारत की आत्मा की रक्षा करना हम सभी का दायित्व है। सनातन संस्कृति ही वह शक्ति है जो हमें हर संकट से उबारती है और राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा देती है।” — राजनाथ सिंह, रक्षा मंत्री

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