नई दिल्ली: भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की आगामी संस्मरण पुस्तक ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ के कुछ अंश सार्वजनिक होने के बाद देश में एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। पुस्तक में सेना की परिचालन तैयारियों और राजनीतिक नेतृत्व के साथ हुए संवादों के कथित विवरणों ने रक्षा गलियारों और संसद के गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के खुलासे भविष्य में सेना और नागरिक नेतृत्व (Civil-Military Relations) के बीच के आपसी विश्वास को प्रभावित कर सकते हैं। वहीं, सत्ता पक्ष ने इन दावों पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इन्हें तथ्यों से परे और अनावश्यक बताया है।
विवाद की जड़: पुस्तक में क्या है ऐसा?
जनरल नरवणे की पुस्तक के जो अंश चर्चा में हैं, वे मुख्य रूप से अग्निपथ योजना और पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ हुए गतिरोध के दौरान के घटनाक्रमों से जुड़े हैं:
- अग्निपथ योजना पर टिप्पणी: कथित तौर पर किताब में उल्लेख है कि सेना ‘अग्निपथ’ के जिस स्वरूप की उम्मीद कर रही थी, वह अंतिम रूप से लागू की गई योजना से अलग था। इसमें भर्ती के मॉडल और प्रशिक्षण की अवधि को लेकर सेना के भीतर के शुरुआती संशयों का जिक्र किया गया है।
- रणनीतिक निर्णय: पूर्वी लद्दाख की स्थिति को लेकर राजनीतिक नेतृत्व और सैन्य कमान के बीच हुए ‘रियल-टाइम’ संवादों के विवरण ने गोपनीयता के मानदंडों पर बहस छेड़ दी है।
विशेषज्ञों की चिंता: ‘भरोसे’ का संकट
रक्षा विशेषज्ञों और पूर्व सैन्य अधिकारियों ने इस विवाद के दूरगामी परिणामों पर चिंता व्यक्त की है:
- गोपनीयता और प्रोटोकॉल: सेना और सरकार के बीच होने वाली उच्च स्तरीय बैठकें अत्यंत गोपनीय होती हैं। जानकारों का कहना है कि यदि सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद ऐसे विवरण सार्वजनिक होते हैं, तो भविष्य में रणनीतिक चर्चाओं के दौरान नेतृत्व अधिक सतर्क या संकोची हो सकता है।
- संस्थागत साख: भारतीय सेना अपनी अराजनीतिक छवि के लिए जानी जाती है। राजनीतिक विवादों में सेना प्रमुखों के संस्मरणों का घसीटा जाना संस्था की साख के लिए चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।
सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग
इस मुद्दे पर देश की राजनीति दो धड़ों में बंट गई है:
- सत्ता पक्ष का रुख: सरकार और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने जनरल नरवणे के दावों को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि ‘अग्निपथ’ जैसी योजनाएं गहन विचार-विमर्श और सभी हितधारकों (Stakeholders) की सहमति के बाद ही लागू की गई हैं। उन्होंने इसे एक पूर्व अधिकारी के ‘व्यक्तिगत विचार’ बताते हुए कहा कि इसे सरकार की नीतियों के विरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
- विपक्ष का प्रहार: कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इस अवसर का उपयोग सरकार को घेरने के लिए किया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने सेना की सलाह को दरकिनार कर अपनी योजनाएं थोपीं, जिसका प्रमाण अब पूर्व सेना प्रमुख की पुस्तक से मिल रहा है।
रक्षा मंत्रालय की समीक्षा
रिपोर्ट्स के अनुसार, रक्षा मंत्रालय पुस्तक की सामग्री की समीक्षा कर रहा है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इसमें कोई ऐसी संवेदनशील जानकारी तो नहीं है जो राष्ट्रीय सुरक्षा के नियमों का उल्लंघन करती हो। फिलहाल, पुस्तक के प्रकाशन को लेकर कुछ तकनीकी पेच भी सामने आए हैं।
“लोकतंत्र में नागरिक नेतृत्व और सेना के बीच का समन्वय आपसी भरोसे की बुनियाद पर टिका होता है। किसी भी पूर्व सैन्य अधिकारी को संस्मरण लिखते समय राष्ट्रीय सुरक्षा की गोपनीयता और पद की गरिमा का ध्यान रखना चाहिए।” — पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार





