जब हाल ही में राष्ट्रपति भवन में यूरोपीय संघ के नेताओं के सम्मान में आयोजित राजकीय भोज का मेन्यू सामने आया, तो उसमें एक अनोखा स्वाद चर्चा का विषय बन गया। यह स्वाद किसी विदेशी व्यंजन या महंगे पकवान का नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पहाड़ों में घर-घर बनने वाली पारंपरिक डिश—सुंदरकला—का था।
हिमालयी व्यंजनों पर आधारित इस विशेष मेन्यू को शेफ प्रतीक साधु ने तैयार किया था। इसमें पहाड़ की सादगी और स्थानीय स्वाद को प्राथमिकता दी गई। सुंदरकला का चयन इसलिए खास था, क्योंकि यह कोई विलासिता का प्रतीक नहीं, बल्कि आम पहाड़ी जीवन का प्रतिनिधित्व करने वाला व्यंजन है।
क्या है सुंदरकला?
सुंदरकला उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र, खासकर चमोली और आसपास के गांवों में बनने वाली हाथ से तैयार की जाने वाली नूडल जैसी डिश है। इसे आमतौर पर गेहूं के आटे से बनाया जाता है, जबकि कई घरों में इसमें मंडुआ (रागी) का मिश्रण भी किया जाता है।
मशीन से बनी नूडल्स के विपरीत, सुंदरकला को हथेली और अंगूठे की मदद से हाथ से आकार दिया जाता है। यही वजह है कि इसकी बनावट मोटी, लचीली और स्वाद में अलग होती है। यह व्यंजन विशेष रूप से सर्दियों में बनाया जाता है, जब पहाड़ों में ऊर्जा देने वाले भोजन की जरूरत अधिक होती है।
कम सामग्री, गहरा स्वाद
सुंदरकला की खासियत इसकी सरलता है।
इसे बनाने के लिए गेहूं का आटा, मंडुआ, नमक, हल्दी और पानी का उपयोग किया जाता है। मंडुआ मिलाने से इसमें फाइबर और पोषण तत्व बढ़ जाते हैं।
तैयार सुंदरकला को सरसों के तेल, लहसुन की पत्तियों, हरी मिर्च और कभी-कभी स्थानीय मसालों के साथ परोसा जाता है। कुछ घरों में इसे दाल, सब्जी या हल्के शोरबे के साथ भी खाया जाता है।
स्वाद की दृष्टि से सुंदरकला की पहचान इसकी ‘चबाने योग्य’ बनावट और मिट्टी जैसी खुशबू है। सरसों के तेल की तीखापन, हरी मिर्च की ताजगी और लहसुन की सुगंध इसके स्वाद को विशिष्ट बनाती है।
भोजन से आगे, संस्कृति का प्रतीक
सुंदरकला केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि पहाड़ी समाज की सामूहिक संस्कृति का प्रतीक है।
पहाड़ों में इसे बनाना अक्सर सामूहिक प्रक्रिया होती है, जिसमें परिवार के कई सदस्य मिलकर आटा गूंथते और नूडल्स तैयार करते हैं। यह प्रक्रिया सामाजिक जुड़ाव और परंपरा का प्रतीक है।
हिमालयी क्षेत्रों में हाथ से बने आटे के व्यंजन सदियों से जीवन का हिस्सा रहे हैं। सुंदरकला भी उसी परंपरा का आधुनिक रूप है—सरल, पौष्टिक और स्थानीय जीवन से जुड़ा हुआ।
पहाड़ का स्वाद, वैश्विक मंच पर
आज जब फास्ट फूड और इंस्टेंट नूडल्स का दौर है, सुंदरकला हमें धीमी जीवन शैली और पारंपरिक स्वाद की याद दिलाती है।
राष्ट्रपति भवन के राजकीय भोज में इसकी मौजूदगी यह संकेत देती है कि भारत अब अपने स्थानीय व्यंजनों को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
सुंदरकला की यह यात्रा—गढ़वाल के गांवों से राष्ट्रपति भवन तक—न केवल एक व्यंजन की कहानी है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय स्वाद के वैश्विक सम्मान की कहानी भी है।




