Saturday, January 31, 2026

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पहाड़ के जायके को मिला ‘ग्लोबल’ पंख: FTA के जरिए यूरोप के बाजारों में धूम मचाएंगे उत्तराखंड के उत्पाद; मंडुआ, झंगोरा और पहाड़ी शहद को मिलेगी नई पहचान

देहरादून: उत्तराखंड के सुदूर पहाड़ों में पैदा होने वाले औषधीय गुणों से भरपूर उत्पादों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार के द्वार खुल गए हैं। भारत और यूरोपीय देशों के बीच होने वाले मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के तहत अब देवभूमि के जैविक उत्पादों को यूरोप में बड़ी पहचान मिलने जा रही है। इस समझौते के लागू होने से न केवल पहाड़ के पारंपरिक अनाज जैसे मंडुआ, झंगोरा और गहत यूरोप की उड़ान भरेंगे, बल्कि स्थानीय किसानों की आय में भी ऐतिहासिक वृद्धि की उम्मीद जताई जा रही है। सरकार का लक्ष्य है कि ‘पहाड़ की सेहत’ को वैश्विक थाली का हिस्सा बनाया जाए।

यूरोपीय बाजारों में क्यों है पहाड़ी उत्पादों की मांग?

यूरोपीय देशों में इन दिनों ‘सुपरफूड’ और ‘ऑर्गेनिक डाइट’ का चलन तेजी से बढ़ रहा है। उत्तराखंड के उत्पादों में छिपे औषधीय गुण वहां के उपभोक्ताओं को आकर्षित कर रहे हैं:

  • ग्लूटेन फ्री अनाज: मंडुआ और झंगोरा जैसे मोटे अनाज प्राकृतिक रूप से ग्लूटेन-मुक्त होते हैं, जो विदेशों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों की पहली पसंद बन रहे हैं।
  • शुद्धता की गारंटी: रसायनों से मुक्त खेती और हिमालयी जलवायु में पैदा होने के कारण यहां की हल्दी, अदरक और शहद की गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरी उतरती है।
  • जीआई टैग का लाभ: उत्तराखंड के कई उत्पादों को पहले ही जीआई टैग (Geographical Indication) मिल चुका है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में उनकी प्रामाणिकता और कीमत बढ़ गई है।

FTA से किसानों को कैसे होगा सीधा फायदा?

मुक्त व्यापार समझौता होने से व्यापारिक बाधाएं कम होंगी और निर्यातकों को बड़ी राहत मिलेगी:

  1. शून्य सीमा शुल्क (Zero Duty): समझौते के बाद यूरोपीय देशों में भारतीय पहाड़ी उत्पादों के निर्यात पर लगने वाला सीमा शुल्क या तो खत्म हो जाएगा या बहुत कम हो जाएगा, जिससे ये उत्पाद वहां सस्ते और प्रतिस्पर्धी होंगे।
  2. सप्लाई चेन का विस्तार: बड़े अंतरराष्ट्रीय स्टोर और फूड चेन अब सीधे उत्तराखंड के किसान समूहों (FPOs) से अनुबंध कर सकेंगे।
  3. ब्रांडिंग और पैकेजिंग: एफटीए के मानकों को पूरा करने के लिए उत्पादों की पैकेजिंग और ग्रेडिंग में सुधार किया जाएगा, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

पहाड़ से यूरोप तक का सफर: सरकार की तैयारी

राज्य सरकार और केंद्र की एजेंसियां (जैसे APEDA) मिलकर निर्यात की राह आसान कर रही हैं:

  • निर्यात केंद्र: राज्य के विभिन्न जिलों में ‘एक्सपोर्ट हब’ विकसित किए जा रहे हैं, जहां उत्पादों की गुणवत्ता जांच और अंतरराष्ट्रीय स्तर की पैकेजिंग की सुविधा होगी।
  • डिजिटल मार्केटिंग: पहाड़ी उत्पादों को वैश्विक ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर लाने के लिए विशेष पोर्टल और ब्रांडिंग अभियान चलाए जा रहे हैं।

आर्थिक विशेषज्ञों का नजरिया: “पलायन पर लगेगा अंकुश”

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पहाड़ के उत्पादों को यूरोप में सही दाम मिलता है, तो यह राज्य से होने वाले पलायन को रोकने में सबसे बड़ा हथियार साबित होगा। जब खेती मुनाफे का सौदा बनेगी, तो युवा अपनी जमीन पर ही रहकर उद्यमी (Agri-entrepreneurs) बन सकेंगे।

“भारत-यूरोपीय संघ के बीच होने वाला यह समझौता उत्तराखंड के किसानों के लिए गेम चेंजर साबित होगा। हमारे उत्पादों में जो शुद्धता और स्वाद है, वह दुनिया में कहीं और नहीं है। अब समय आ गया है कि ‘लोकल फॉर ग्लोबल’ के मंत्र को साकार किया जाए।” — प्रवक्ता, कृषि एवं उद्योग विभाग, उत्तराखंड

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