देहरादून/हल्द्वानी: देवभूमि उत्तराखंड में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली की एक और हृदयविदारक घटना सामने आई है। अस्पताल से हायर सेंटर ले जाते समय एंबुलेंस में ऑक्सीजन खत्म हो जाने के कारण एक बीमार महिला की तड़प-तड़प कर मौत हो गई। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन और एंबुलेंस कर्मियों की घोर लापरवाही के चलते समय पर ऑक्सीजन नहीं मिल सकी, जिससे यह हादसा हुआ। इस घटना ने एक बार फिर राज्य के सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं और आपातकालीन सेवाओं के दावों की पोल खोल दी है।
घटना का विवरण: रास्ते में ही थम गईं सांसें
प्राप्त जानकारी के अनुसार, पीड़ित महिला को सांस लेने में तकलीफ और अन्य गंभीर लक्षणों के चलते स्थानीय सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
- रेफर करने में देरी: अस्पताल में वेंटिलेटर या उचित सुविधाओं के अभाव में डॉक्टरों ने उसे हायर सेंटर (बड़े अस्पताल) के लिए रेफर कर दिया।
- एंबुलेंस का सफर बना काल: परिजनों ने बताया कि मरीज को सरकारी एंबुलेंस में शिफ्ट किया गया था। सफर के दौरान जब मरीज की हालत बिगड़ी और ऑक्सीजन की जरूरत पड़ी, तब पता चला कि एंबुलेंस में मौजूद ऑक्सीजन सिलेंडर खाली है।
- तड़पते रहे परिजन: ऑक्सीजन न होने के कारण महिला का दम घुटने लगा। चालक ने पास के किसी क्लीनिक या अन्य अस्पताल से मदद लेने की कोशिश की, लेकिन जब तक ऑक्सीजन की व्यवस्था होती, महिला की मौत हो चुकी थी।
परिजनों का फूटा गुस्सा, अस्पताल में हंगामा
महिला की मौत के बाद आक्रोशित परिजनों ने शव को अस्पताल के बाहर रखकर प्रदर्शन किया और दोषी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
- चेक नहीं किया गया बैकअप: परिजनों का कहना है कि एंबुलेंस रवाना करने से पहले यह सुनिश्चित करना अस्पताल प्रशासन की जिम्मेदारी थी कि जीवन रक्षक उपकरण और ऑक्सीजन पूरी तरह चालू हालत में हैं या नहीं।
- जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते अधिकारी: शुरूआती जानकारी में अस्पताल प्रबंधन ने एंबुलेंस सेवा के निजी वेंडर पर ठीकरा फोड़ने की कोशिश की है, जबकि नियमों के अनुसार मेडिकल फिटनेस की जांच अनिवार्य है।
जांच के आदेश, सीएमओ ने दी सफाई
मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है। संबंधित जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) ने घटना की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए हैं।
- कमेटी का गठन: एक तीन सदस्यीय टीम बनाई गई है जो 48 घंटे के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपेगी कि सिलेंडर खाली क्यों था और ड्यूटी पर मौजूद पैरामेडिकल स्टाफ ने इसकी जांच क्यों नहीं की थी।
- कठोर कार्रवाई का आश्वासन: अधिकारियों का कहना है कि यदि लापरवाही पाई जाती है, तो संबंधित एंबुलेंस कर्मी और जिम्मेदार अधिकारियों की सेवा समाप्त की जा सकती है।
पहाड़ में स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौतियां
यह कोई पहली घटना नहीं है जब उत्तराखंड के दूरस्थ क्षेत्रों में एंबुलेंस या ऑक्सीजन की कमी से किसी की जान गई हो।
- उपकरणों का अभाव: कई सरकारी एंबुलेंस केवल ‘मरीज ढोने वाली गाड़ी’ बनकर रह गई हैं, जिनमें न तो प्रशिक्षित स्टाफ होता है और न ही पर्याप्त दवाइयां।
- रेफरल का बोझ: छोटे अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के कारण हर गंभीर मरीज को ऋषिकेश या हल्द्वानी रेफर कर दिया जाता है, जिससे रास्ते में ही जान जाने का खतरा बना रहता है।
“यह घटना बेहद शर्मनाक और दुखद है। किसी भी एंबुलेंस को बिना ऑक्सीजन चेक किए मरीज के साथ भेजना अपराध है। हम मामले की तह तक जाएंगे और दोषियों को सख्त सजा देंगे ताकि भविष्य में किसी और मां या बहन के साथ ऐसा न हो।” — स्वास्थ्य अधिकारी, उत्तराखंड सरकार





