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आयुर्वेदिक छात्रवृत्ति में भेदभाव पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: उत्तराखंड सरकार और विश्वविद्यालय को नोटिस; गुरुकुल कैंपस हरिद्वार का मामला

नई दिल्ली/हरिद्वार: उत्तराखंड के हरिद्वार स्थित गुरुकुल आयुर्वेदिक कैंपस में मासिक छात्रवृत्ति (Stipend) के वितरण में कथित भेदभाव का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज पर पहुँच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तराखंड सरकार, आयुष विभाग और संबंधित विश्वविद्यालय को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि एक ही संस्थान और पाठ्यक्रम के छात्रों के बीच छात्रवृत्ति की राशि को लेकर असमानता बरती जा रही है, जो मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

क्या है पूरा विवाद?

मामले की जड़ हरिद्वार के गुरुकुल कैंपस में पढ़ रहे बीएएमएस (BAMS) के छात्रों को मिलने वाली मासिक छात्रवृत्ति में अंतर है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि संस्थान में दो अलग-अलग श्रेणियों के माध्यम से प्रवेश लेने वाले छात्रों को अलग-अलग वजीफा दिया जा रहा है:

  • असमान वितरण: आरोप है कि राज्य कोटे और अखिल भारतीय कोटे से आए छात्रों या अलग-अलग बैच के छात्रों के बीच छात्रवृत्ति की राशि में भारी विसंगति है।
  • छात्रों की मांग: छात्रों का कहना है कि जब पाठ्यक्रम, शिक्षण संस्थान और इंटर्नशिप की जिम्मेदारियां एक समान हैं, तो छात्रवृत्ति की राशि में यह भेदभाव तर्कहीन और अन्यायपूर्ण है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और नोटिस

प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इस पर विस्तृत सुनवाई का निर्णय लिया है।

  1. सरकार से मांगा जवाब: अदालत ने उत्तराखंड शासन से पूछा है कि छात्रवृत्ति के निर्धारण के लिए क्या मापदंड अपनाए गए हैं और इस विसंगति का आधार क्या है।
  2. समान कार्य, समान वजीफा: याचिका में ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ के सिद्धांत का हवाला देते हुए मांग की गई है कि सभी आयुर्वेदिक इंटर्न को एक समान और सम्मानजनक छात्रवृत्ति दी जानी चाहिए।

गुरुकुल कैंपस में पहले भी हुआ था विरोध

गौरतलब है कि इस मुद्दे को लेकर हरिद्वार के गुरुकुल आयुर्वेदिक कैंपस के छात्र लंबे समय से आंदोलनरत थे। छात्रों ने कई बार विश्वविद्यालय प्रशासन और शासन के समक्ष अपनी मांगें रखी थीं, लेकिन कोई ठोस समाधान न निकलने के कारण उन्हें कानूनी रास्ता अख्तियार करना पड़ा। छात्रों का आरोप है कि उन्हें मिलने वाली राशि अन्य चिकित्सा पद्धतियों (जैसे एमबीबीएस) के इंटर्न की तुलना में पहले से ही कम है, और उसमें भी यह आंतरिक भेदभाव उनकी आर्थिक स्थिति को प्रभावित कर रहा है।

आयुष मंत्रालय के मानकों पर सवाल

यह मामला केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अन्य आयुर्वेदिक संस्थानों में भी छात्रवृत्ति की दरों में भिन्नता को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप पूरे देश में आयुष (AYUSH) के छात्रों के लिए एक समान छात्रवृत्ति नीति बनाने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है।

अदालत ने प्रतिवादियों को अपना पक्ष रखने के लिए समय दिया है। अब सभी की नजरें राज्य सरकार के जवाब पर टिकी हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट छात्रों के पक्ष में फैसला सुनाता है, तो विश्वविद्यालय को पिछले बकाये (Arrears) के साथ समान छात्रवृत्ति का भुगतान करना पड़ सकता है।

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