Saturday, January 31, 2026

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I-PAC को करोड़ों का कर्ज देने वाली कंपनी पर गहराया रहस्य: 13.5 करोड़ के लोन का मामला, जांच में नहीं मिला कंपनी का पता

नई दिल्ली/हैदराबाद: प्रसिद्ध चुनावी रणनीतिकार संस्था I-PAC (इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी) एक नए विवाद के केंद्र में आ गई है। एक हालिया जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि जिस कंपनी ने I-PAC को 13.5 करोड़ रुपये का बड़ा लोन दिया था, धरातल पर उसका कोई वजूद ही नहीं मिल रहा है। सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज पते पर जब जांच टीम पहुँची, तो वहां कंपनी का नामोनिशान तक नहीं मिला, जिससे अब ‘शेल कंपनियों’ के जरिए लेन-देन की आशंका गहरा गई है।

कागजों पर कंपनी, जमीन पर सन्नाटा

मामले का खुलासा तब हुआ जब I-PAC के वित्तीय लेन-देन की पड़ताल की गई। दस्तावेजों के अनुसार, एक निजी फर्म ने संस्था को साढ़े तेरह करोड़ रुपये का ऋण (लोन) दिया था। नियमों के मुताबिक, जब इस कंपनी के पंजीकृत कार्यालय (Registered Office) का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) किया गया, तो वहां न तो कोई ऑफिस मिला और न ही कंपनी से जुड़ा कोई कर्मचारी। जिस इमारत का पता दिया गया था, वहां के लोगों ने ऐसी किसी भी कंपनी की जानकारी होने से इनकार कर दिया है।

फंडिंग के स्रोत पर उठे सवाल

I-PAC, जो विभिन्न राजनीतिक दलों के लिए चुनावी रणनीति तैयार करने का काम करती है, उसके पास इतनी बड़ी राशि एक ‘बेनामी’ कंपनी से आना कई गंभीर सवाल खड़े करता है:

  • शेल कंपनी का शक: क्या यह केवल कागजों पर चलने वाली कोई शेल कंपनी है जिसका इस्तेमाल धन के हेरफेर के लिए किया गया?
  • राजनैतिक कनेक्शन: क्या इस लोन के पीछे किसी राजनीतिक दल या किसी बड़े नेता का हाथ है, जिसने अपनी पहचान छिपाने के लिए इस गुमनाम कंपनी का सहारा लिया?

जांच एजेंसियों की रडार पर मामला

इस खुलासे के बाद अब प्रवर्तन निदेशालय (ED) और आयकर विभाग (IT) जैसी जांच एजेंसियों की सक्रियता बढ़ने की संभावना है। वित्तीय जानकारों का कहना है कि 13.5 करोड़ जैसी बड़ी राशि का बिना किसी ठोस आधार वाली कंपनी से लेन-देन सीधे तौर पर ‘मनी लॉन्ड्रिंग’ (धन शोधन) की श्रेणी में आ सकता है। यदि कंपनी का अस्तित्व साबित नहीं होता है, तो I-PAC की मुश्किलें बढ़ सकती हैं और उसे इस फंड के वास्तविक स्रोत का खुलासा करना होगा।

I-PAC की ओर से सफाई का इंतज़ार

इस पूरे घटनाक्रम पर फिलहाल I-PAC की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव के समय इस तरह के खुलासे न केवल संस्था की साख पर बट्टा लगाते हैं, बल्कि उन पार्टियों के लिए भी असहज स्थिति पैदा करते हैं जो इस संस्था की सेवाएं लेती रही हैं।

आने वाले दिनों में इस ‘लापता’ कंपनी और करोड़ों के लोन के पीछे के असली चेहरों का खुलासा होने की उम्मीद है।

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