Saturday, January 31, 2026

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बांग्लादेश बना महाशक्तियों का अखाड़ा: अमेरिका और चीन के बीच ढाका में ‘रस्साकशी’, भारत की बढ़ी चिंताएं

नई दिल्ली/ढाका: दक्षिण एशिया की राजनीति में इन दिनों बांग्लादेश एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है, जहाँ वैश्विक महाशक्तियाँ—अमेरिका और चीन—अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए एक-दूसरे के आमने-सामने खड़ी हैं। ढाका में चल रही इस कूटनीतिक ‘रस्साकशी’ ने न केवल क्षेत्रीय संतुलन को हिला दिया है, बल्कि पड़ोसी देश होने के नाते भारत की रणनीतिक और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को भी गहरा कर दिया है।

अमेरिका और चीन के अपने-अपने दांव

बांग्लादेश की भौगोलिक स्थिति बंगाल की खाड़ी के मुहाने पर है, जो इसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific) के लिए बेहद महत्वपूर्ण बनाती है।

  • चीन की रणनीति: चीन अपनी ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के तहत बांग्लादेश में बुनियादी ढांचे, बंदरगाहों और रेल परियोजनाओं में अरबों डॉलर का निवेश कर रहा है। चीन का लक्ष्य बांग्लादेश को अपने आर्थिक प्रभाव में लेकर भारत की घेराबंदी करना है।
  • अमेरिका का रुख: दूसरी ओर, अमेरिका बांग्लादेश में लोकतंत्र, मानवाधिकार और स्वतंत्र चुनाव के मुद्दों को लेकर काफी मुखर रहा है। अमेरिका चाहता है कि बांग्लादेश उसकी ‘इंडो-पैसिफिक रणनीति’ का हिस्सा बने ताकि इस क्षेत्र में चीनी प्रभुत्व को चुनौती दी जा सके।

ढाका में कूटनीतिक खींचतान

हाल के महीनों में ढाका में विदेशी राजनयिकों की सक्रियता काफी बढ़ गई है। जहाँ चीन निवेश के जरिए शेख हसीना सरकार (या वर्तमान नेतृत्व) के करीब बने रहने की कोशिश कर रहा है, वहीं अमेरिका प्रतिबंधों और कूटनीतिक दबाव के जरिए अपनी बात मनवाने का प्रयास कर रहा है। इस खींचतान ने बांग्लादेशी नेतृत्व को एक कठिन स्थिति में डाल दिया है, जहाँ उन्हें दोनों महाशक्तियों के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है।

भारत के लिए चिंता के मुख्य कारण

बांग्लादेश में चीन और अमेरिका की इस सक्रियता ने नई दिल्ली के नीति निर्माताओं को सतर्क कर दिया है। भारत के लिए चिंता के तीन मुख्य पहलू हैं:

  1. चिकन नेक (Siliguri Corridor) की सुरक्षा: यदि बांग्लादेश में चीनी प्रभाव अत्यधिक बढ़ता है, तो भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों को जोड़ने वाले संकीर्ण गलियारे ‘चिकन नेक’ के लिए सुरक्षा खतरा पैदा हो सकता है।
  2. सुरक्षा और स्थिरता: भारत नहीं चाहता कि उसके पड़ोस में कोई भी ऐसी अस्थिरता पैदा हो जिसका फायदा कट्टरपंथी ताकतें उठा सकें। अमेरिका का अत्यधिक हस्तक्षेप कभी-कभी आंतरिक राजनीति को अस्थिर कर सकता है, जिसका सीधा असर भारत की सीमा सुरक्षा पर पड़ता है।
  3. क्षेत्रीय नेतृत्व: भारत पारंपरिक रूप से बांग्लादेश का सबसे करीबी साझेदार रहा है। चीन का बढ़ता आर्थिक कर्ज (Debt Trap) बांग्लादेश को भारत के प्रभाव क्षेत्र से दूर ले जा सकता है, जो भारत के ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति के लिए एक बड़ी चुनौती है।

आगे की राह

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को बांग्लादेश के साथ अपने सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंधों को और मजबूत करना होगा। साथ ही, ढाका को यह भरोसा दिलाना होगा कि भारत उसकी संप्रभुता का सम्मान करते हुए एक विश्वसनीय विकास साझेदार है। भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह बांग्लादेश को वैश्विक शक्तियों की प्रतिद्वंद्विता का शिकार होने से कैसे बचाए।

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