Saturday, January 31, 2026

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भारतीय नौसेना की ‘शक्ति’ बना GRSE: 115 युद्धपोतों के निर्माण का ऐतिहासिक रिकॉर्ड; 90% स्वदेशी तकनीक और 20,200 करोड़ के ऑर्डर बुक के साथ बना रक्षा क्षेत्र का ‘गेम चेंजर’

कोलकाता/नई दिल्ली: भारतीय रक्षा क्षेत्र में ‘आत्मनिर्भर भारत’ का सपना अब धरातल पर पूरी मजबूती के साथ उतरता दिख रहा है। कोलकाता स्थित सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) ने युद्धपोत निर्माण के क्षेत्र में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान स्थापित किया है। कंपनी ने अब तक कुल 115 युद्धपोतों की डिलीवरी कर एक ऐसा रिकॉर्ड बनाया है, जो देश के किसी अन्य शिपयार्ड के पास नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन युद्धपोतों में 90 प्रतिशत तक स्वदेशी सामग्री और तकनीक का उपयोग किया गया है, जो विदेशी निर्भरता को लगभग समाप्त कर देता है। 20,200 करोड़ रुपये के विशाल ‘ऑर्डर बुक’ के साथ GRSE न केवल भारतीय नौसेना को आधुनिक बना रहा है, बल्कि रक्षा निर्यात के मामले में भी गेम चेंजर साबित हो रहा है।

GRSE की सफलता के तीन मुख्य स्तंभ

GRSE की इस असाधारण सफलता के पीछे उसकी तकनीकी कुशलता और दूरगामी सोच रही है:

  1. स्वदेशीकरण का नया मानक (High Indigenization): GRSE ने अपने नवीनतम प्रोजेक्ट्स में 90% तक स्वदेशी कलपुर्जों का उपयोग किया है। इसमें आधुनिक हथियार प्रणालियाँ, सेंसर और स्टील्थ तकनीक (रडार से बचने की तकनीक) शामिल हैं। यह उपलब्धि भारत को उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा करती है जो स्वयं के जटिल युद्धपोत बनाने में सक्षम हैं।
  2. उन्नत युद्धपोतों का निर्माण (Advanced Warships): कंपनी वर्तमान में भारतीय नौसेना के लिए बेहद घातक ‘प्रोजेक्ट 17A’ के स्टील्थ फ्रिगेट और एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (ASW SWC) का निर्माण कर रही है। ये जहाज समुद्र में दुश्मन की पनडुब्बियों और रडार को मात देने में दुनिया के श्रेष्ठ जहाजों के बराबर हैं।
  3. भविष्य की सुरक्षित नींव (Robust Order Book): वर्तमान में कंपनी के पास 20,200 करोड़ रुपये से अधिक के ऑर्डर लंबित हैं। इसमें भारतीय नौसेना के अलावा तटरक्षक बल (Coast Guard) और विदेशी देशों के लिए गश्ती जहाजों का निर्माण शामिल है। यह वित्तीय मजबूती कंपनी को अनुसंधान और विकास (R&D) में निवेश करने की ताकत देती है।

कैसे बना ‘गेम चेंजर’?

GRSE ने पारंपरिक जहाज निर्माण की प्रक्रिया को बदलकर आधुनिक ‘मॉड्यूलर कंस्ट्रक्शन’ तकनीक को अपनाया है:

  • समय की बचत: मॉड्यूलर तकनीक की मदद से जहाजों के विभिन्न हिस्सों को अलग-अलग बनाकर एक साथ जोड़ा जाता है, जिससे निर्माण का समय 20-30 प्रतिशत तक कम हो गया है।
  • निर्यात में बढ़त: कंपनी ने हाल ही में गुयाना और अन्य देशों को सफलतापूर्वक जहाज निर्यात किए हैं, जिससे भारत ‘नेट डिफेंस एक्सपोर्टर’ बनने की दिशा में बढ़ रहा है।
  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI): शिपयार्ड अब जहाजों के डिजाइन और डेटा प्रबंधन के लिए एआई और डिजिटल ट्विन तकनीक का उपयोग कर रहा है, जो सटीकता को बढ़ाता है।

भविष्य की चुनौतियां और अवसर

विशेषज्ञों का मानना है कि GRSE की अगली चुनौती ‘नेक्स्ट जनरेशन’ के मानव रहित जहाजों (Unmanned Vessels) और स्वायत्त प्रणालियों का विकास करना है। जिस तरह से हिंद महासागर में सुरक्षा चुनौतियां बढ़ रही हैं, GRSE की भूमिका भारतीय समुद्री सीमाओं को अभेद्य बनाने में सबसे महत्वपूर्ण होने वाली है।

निष्कर्ष: रक्षा क्षेत्र का नया चमकता सितारा

115 युद्धपोतों की यात्रा केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि यह भारतीय इंजीनियरों और श्रमिकों के कौशल का प्रमाण है। 20,200 करोड़ के भविष्य के साथ GRSE यह सुनिश्चित कर रहा है कि आने वाले समय में भारत की समुद्री सीमाओं की रक्षा ‘मेड इन इंडिया’ जहाजों के हाथों में होगी। यह सफलता कहानी भारत को वैश्विक ‘शिपबिल्डिंग हब’ बनाने की दिशा में एक निर्णायक कदम है।

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