ऋषिकेश: तीर्थनगरी ऋषिकेश के आसपास के ग्रामीण और वन क्षेत्रों में भूमि अधिकारों को लेकर उपजा विवाद अब सड़कों पर उतर आया है। बड़ी संख्या में स्थानीय निवासियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों ने वन विभाग की कथित ‘दमनकारी’ नीतियों के खिलाफ जोरदार धरना-प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट कहना है कि वे पीढ़ियों से इन क्षेत्रों में रह रहे हैं, लेकिन अब वन विभाग द्वारा उन्हें उनकी ही पुश्तैनी जमीन और जंगलों से बेदखल करने की साजिश रची जा रही है। “हमारे हक-हकूकों की रक्षा जरूरी है” के नारों के साथ आंदोलनकारियों ने सरकार से इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करने और स्थानीय लोगों के पारंपरिक अधिकारों को कानूनी मान्यता देने की मांग की है।
विवाद की मुख्य वजह: अतिक्रमण बनाम अधिकार
यह विवाद वन विभाग द्वारा हाल ही में की गई ‘सीमांकन’ की कार्रवाई के बाद और अधिक गहरा गया है:
- वन विभाग का पक्ष: विभाग का तर्क है कि कई क्षेत्रों में वन भूमि पर अवैध अतिक्रमण किया गया है, जिसे हटाना पर्यावरण संरक्षण और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के लिए अनिवार्य है।
- स्थानीय लोगों का तर्क: ग्रामीणों का कहना है कि वे ब्रिटिश काल और उससे भी पहले से इन क्षेत्रों में निवास कर रहे हैं। वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत उन्हें जल, जंगल और जमीन का अधिकार मिलना चाहिए, जिसे प्रशासन नजरअंदाज कर रहा है।
- विकास बनाम विस्थापन: स्थानीय लोगों का आरोप है कि बड़ी परियोजनाओं के लिए तो जंगल काट दिए जाते हैं, लेकिन जब गरीब ग्रामीण अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए सूखी लकड़ी या चारे का इस्तेमाल करते हैं, तो उन्हें अपराधी बना दिया जाता है।
प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगें
आंदोलनकारियों ने प्रशासन के सामने अपनी मांगों का एक चार्टर पेश किया है:
- भूमि का नियमितीकरण: दशकों से बसे हुए गांवों और बस्तियों को वन भूमि से बाहर कर उन्हें राजस्व ग्राम का दर्जा दिया जाए।
- उत्पीड़न पर रोक: वन विभाग द्वारा ग्रामीणों पर दर्ज किए गए ‘फर्जी’ मुकदमों को तुरंत वापस लिया जाए।
- बुनियादी सुविधाएं: वन भूमि के पेंच में फंसी सड़क, बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं के निर्माण की अनुमति दी जाए।
- नया सीमांकन: स्थानीय जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी में जमीन का दोबारा पारदर्शी सीमांकन कराया जाए।
राजनीतिक और सामाजिक समर्थन
इस प्रदर्शन को विभिन्न संगठनों का व्यापक समर्थन मिल रहा है:
- स्थानीय संगठनों की एकजुटता: कई ग्राम प्रधानों और क्षेत्र पंचायत सदस्यों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने जल्द ही कोई ठोस निर्णय नहीं लिया, तो वे उग्र आंदोलन और जेल भरो अभियान शुरू करेंगे।
- विपक्ष की एंट्री: मुख्य विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को लपक लिया है और सरकार पर ‘गरीब विरोधी’ होने का आरोप लगाया है।
निष्कर्ष: समाधान की दिशा में बढ़ते कदम?
ऋषिकेश का यह वन भूमि विवाद केवल एक कानूनी मामला नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की रोजी-रोटी और पहचान से जुड़ा भावनात्मक मुद्दा भी है। जहाँ एक ओर पर्यावरण संरक्षण जरूरी है, वहीं दूसरी ओर ‘पहाड़ के हक-हकूक’ की रक्षा करना भी सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है। अब देखना होगा कि शासन इस विवाद को सुलझाने के लिए बीच का कौन सा रास्ता निकालता है।





