Thursday, March 5, 2026

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उत्तराखंड में कुदरत का अजब खेल: जनवरी में ही ‘मई-जून’ जैसी तपिश; पहाड़ों से लेकर मैदानों तक लगातार चढ़ रहा पारा, समय से पहले ठंड हुई ‘छूमंतर’

देहरादून/नैनीताल: देवभूमि उत्तराखंड में इस साल मौसम के तेवर पूरी तरह बदले हुए नजर आ रहे हैं। आम तौर पर जनवरी के महीने में जहाँ पहाड़ बर्फ की सफेद चादर से ढके रहते थे और मैदानों में शीतलहर का प्रकोप रहता था, वहीं इस बार सूरज की तपिश ने लोगों के पसीने छुड़ा दिए हैं। पिछले कुछ दिनों से प्रदेश के अधिकतम तापमान में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है, जिससे ऐसा महसूस हो रहा है मानो ठंड समय से पहले ही विदा हो गई हो। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) की कमी और शुष्क मौसम के कारण पहाड़ों में धूप तीखी हो गई है, जिससे ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और पारिस्थितिकी तंत्र पर बुरा असर पड़ने की आशंका गहरा गई है।

तापमान में उछाल: सामान्य से ऊपर पहुंचा पारा

प्रदेश के प्रमुख शहरों में तापमान सामान्य से कई डिग्री सेल्सियस ऊपर चल रहा है:

  • मैदानी इलाकों का हाल: देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर में दिन का तापमान 25 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुँच रहा है, जो सामान्य से 4 से 6 डिग्री अधिक है।
  • पहाड़ों में गर्माहट: मसूरी, नैनीताल और मुक्तेश्वर जैसे हिल स्टेशनों पर भी सुबह-शाम की हल्की ठंड को छोड़कर दिन में तेज धूप खिली रह रही है।
  • बर्फबारी का अभाव: केदारनाथ, बद्रीनाथ और औली जैसे ऊँचाई वाले क्षेत्रों में भी इस बार उम्मीद के मुताबिक बर्फबारी नहीं हुई है, जिससे पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोग चिंतित हैं।

मौसम बदलने के प्रमुख कारण

विशेषज्ञों ने इस असामान्य गर्मी के पीछे कई भौगोलिक और जलवायु परिवर्तन संबंधी कारण बताए हैं:

  1. कमजोर पश्चिमी विक्षोभ: इस साल हिमालयी क्षेत्रों में सक्रिय होने वाले पश्चिमी विक्षोभ काफी कमजोर रहे हैं। नमी की कमी के कारण न तो बारिश हुई और न ही बर्फबारी, जिससे हवा में ठंडक पैदा नहीं हो पाई।
  2. क्लाइमेट चेंज का असर: ग्लोबल वार्मिंग के चलते पूरे हिमालयी बेल्ट के तापमान में वृद्धि देखी जा रही है, जिसका सीधा असर उत्तराखंड के स्थानीय मौसम पर पड़ रहा है।
  3. शुष्क हवाएं: उत्तर-पश्चिम से आने वाली शुष्क हवाओं ने वातावरण में मौजूद नमी को सोख लिया है, जिससे आसमान साफ है और सूरज की किरणें सीधे धरती पर पहुँचकर गर्मी बढ़ा रही हैं।

खेती और स्वास्थ्य पर पड़ रहा प्रतिकूल प्रभाव

मौसम के इस अचानक बदलाव ने किसानों और आम जनता की मुश्किलों को बढ़ा दिया है:

  • रबी की फसल को नुकसान: गेहूं और मटर जैसी फसलों के लिए इस समय ठंड और हल्की बारिश की जरूरत होती है। ज्यादा तापमान के कारण फसलें समय से पहले पक सकती हैं, जिससे पैदावार कम होने का खतरा है।
  • बीमारियों का खतरा: दिन में तेज गर्मी और रात को अचानक गिरने वाले तापमान के कारण वायरल बुखार, सर्दी-खांसी और सांस संबंधी बीमारियों के मरीजों की संख्या अस्पतालों में बढ़ रही है।
  • जल संकट की आहट: सर्दियों में बर्फबारी न होने से गर्मियों में जल स्रोतों के सूखने और नदियों में जलस्तर कम होने की बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है।

 

मौसम विभाग ने पूर्वानुमान जताया है कि यदि अगले कुछ दिनों में कोई सशक्त पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय होता है, तभी तापमान में गिरावट आने की संभावना है। फिलहाल, जनवरी के महीने में मिल रही इस ‘गर्मी की राहत’ को पर्यावरणविद भविष्य के लिए एक खतरे की घंटी मान रहे हैं।

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