उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित देश के प्रमुख स्की डेस्टिनेशन औली इस साल अभूतपूर्व सूखी सर्दी का सामना कर रहा है। जनवरी का मध्य—जो आमतौर पर बर्फ से ढके सफेद ढलानों का समय होता है—लेकिन इस बार पहाड़ वीरान और सूखे पड़े हैं। इसी संकट के बीच स्थानीय लोग ‘सेव औली’ आंदोलन के तहत कृत्रिम बर्फ मशीनें चालू करने की मांग को लेकर चरणबद्ध भूख हड़ताल पर बैठे हैं।
सूखी सर्दी का गंभीर संकट
भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, उत्तराखंड में इस सर्दी अब तक न तो बारिश हुई है और न बर्फबारी। दिसंबर 2025 में 100 प्रतिशत वर्षा की कमी दर्ज की गई—जो दशकों में सबसे शुष्क सर्दी मानी जा रही है।
आमतौर पर पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) भूमध्यसागर से नमी लाकर हिमालय में बर्फबारी कराते हैं, लेकिन इस बार ये कमजोर और देर से आए। वैज्ञानिक इसे जलवायु परिवर्तन से जोड़कर देख रहे हैं, जिसने मौसम पैटर्न को बिगाड़ दिया है।
नतीजा यह हुआ कि रात का तापमान माइनस 6 डिग्री तक गिरने के बावजूद ढलानों पर बर्फ नहीं जमी। इसका सीधा असर पर्यटन पर पड़ा है—जोशीमठ के होटलों में ऑक्यूपेंसी 10–15% तक गिर गई है, जबकि यही महीना आमतौर पर पीक सीजन होता है।
स्थानीय लोगों की मांगें
कुमाऊं जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, 15 जनवरी 2026 से स्थानीय लोग चरणबद्ध भूख हड़ताल पर हैं, जो 17 जनवरी को तीसरे दिन में प्रवेश कर चुकी थी।
प्रदर्शन में शामिल हैं:
- युवा स्थानीय निवासी
- घोड़ा-खच्चर संचालक
- टैक्सी ड्राइवर
- महिला समूह
इनकी प्रमुख मांगें हैं:
- 2011 में लगी कृत्रिम बर्फ मशीनों को तुरंत चालू करना
- इस प्रोजेक्ट पर ₹6.5 करोड़ खर्च हुए थे
- इसमें एक हाई-एल्टीट्यूड झील और 24 स्नो-गन शामिल हैं
- लेकिन परीक्षण के बाद ये सिस्टम वर्षों से बंद पड़ा है और जंग खा रहा है
- आइस स्केटिंग रिंक को फिर से चालू करना
- जोशीमठ–औली रोपवे का काम तेज करना
- सुरक्षा कारणों से यह 2023 से बंद है
- स्थानीय लोग चाहते हैं कि इसे जल्द बहाल किया जाए ताकि पर्यटन लौट सके
उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) ने भी आंदोलन का समर्थन करते हुए सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाया है।
कृत्रिम बर्फ कैसे बनती है?
कृत्रिम बर्फ बनाने की तकनीक सरल लेकिन प्रभावी है। हाई-प्रेशर मशीनें पानी और हवा को मिलाकर महीन धुंध बनाती हैं, जो ठंडी और कम नमी वाली हवा में जमकर बर्फ के क्रिस्टल बना देती है।
दुनिया के कई स्की रिसॉर्ट—स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया और जापान—कम बर्फ वाले वर्षों में इसी तकनीक पर निर्भर रहते हैं।
हालांकि इसके साथ चुनौतियां भी हैं:
- ज्यादा पानी की जरूरत
- अधिक बिजली खपत
- पर्यावरणीय प्रभाव
फिर भी, बदलते मौसम के दौर में इसे आवश्यक अनुकूलन (Climate Adaptation Tool) माना जा रहा है।
जहां पहले औली प्राकृतिक बर्फ पर निर्भर था, वहीं अब स्थानीय लोग तकनीक के सहारे अपनी आजीविका बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
आंदोलन का संदेश साफ है—
“अगर प्रकृति साथ नहीं दे रही, तो हमें खुद बर्फ बनानी होगी।”





