Sunday, November 30, 2025

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कृषि उत्पादन ही नहीं, मजदूरों की क्षमता को भी घटा रहा बढ़ता तापमान

नई दिल्ली। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते असर ने दुनिया भर में कृषि उत्पादन और श्रमिकों की उत्पादकता पर गंभीर प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थानों की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ता तापमान अब सिर्फ फसलों के उत्पादन को नहीं घटा रहा, बल्कि मजदूरों की काम करने की क्षमता को भी तेजी से कम कर रहा है। भारत सहित पांच देशों को इस संकट का सबसे अधिक सामना करना पड़ रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि लगातार बढ़ रहा तापमान खेतों में काम करने वाले श्रमिकों पर सीधा असर डालता है। उच्च तापमान में लंबे समय तक काम करने से न सिर्फ उनकी शारीरिक क्षमता प्रभावित होती है, बल्कि हीट स्ट्रेस की वजह से बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। ऐसी परिस्थितियों में मजदूरों का कार्य समय कम हो जाता है और उत्पादन पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और इंडोनेशिया वे पांच देश हैं, जहां तापमान वृद्धि का असर सबसे अधिक दिखाई दे रहा है। इन देशों की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कृषि और श्रम-प्रधान क्षेत्रों पर निर्भर है, जिसके कारण तापमान में थोड़ी सी भी बढ़ोतरी बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती है। भारत में भी कई राज्यों में खेती और निर्माण कार्य करने वाले मजदूरों को दिन में काम रोककर शाम या रात में काम करना पड़ रहा है।

रिपोर्ट बताती है कि 2020 के बाद से गर्मी की तीव्रता में रिकॉर्ड स्तर की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके चलते खेतों में काम करने वाले मजदूरों की उत्पादकता में 10 से 15 प्रतिशत तक की गिरावट देखी जा रही है। दूसरी ओर, तापमान बढ़ने से फसलों की वृद्धि प्रभावित होती है, जिससे खाद्यान्न उत्पादन में कमी का खतरा भी बढ़ जाता है।

जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि यदि गर्मी की यह बढ़ती रफ्तार नहीं रुकी, तो आने वाले वर्षों में खाद्य सुरक्षा और श्रम-प्रधान उद्योगों पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। उन्होंने सुझाव दिया है कि सरकारों और उद्योगों को श्रमिकों के लिए अनुकूल कार्य वातावरण तैयार करने, शीतलन सुविधाएं उपलब्ध कराने तथा कृषि क्षेत्र में टिकाऊ तकनीकों को अपनाने की दिशा में तत्काल कदम उठाने चाहिए।

कुल मिलाकर, बढ़ता तापमान अब एक वैश्विक आर्थिक और सामाजिक चुनौती बन चुका है, जिसका सीधा असर किसानों, मजदूरों और कृषि उत्पादन पर दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में इसका असर और भी व्यापक हो सकता है।

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