नई दिल्ली। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने वित्तीय मामलों और व्हाइट कॉलर अपराधों को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि हर वित्तीय लेन-देन या आर्थिक विवाद को आपराधिक दृष्टि से नहीं देखा जा सकता, और प्रत्येक मामले में कार्रवाई न होने का अर्थ यह नहीं कि वह व्हाइट कॉलर क्राइम है।
दिल्ली में आयोजित एक विधिक संगोष्ठी को संबोधित करते हुए पूर्व सीजेआई ने कहा कि आर्थिक मामलों में जांच और दंड प्रक्रिया बेहद जटिल होती है। “कभी-कभी वित्तीय लेन-देन में अनजाने में हुई गलती या प्रक्रियागत चूक को भी अपराध मान लिया जाता है, जबकि न्याय का मूल उद्देश्य परिस्थितियों की गहराई से पड़ताल करना है,” उन्होंने कहा।
न्यायमूर्ति खन्ना ने यह भी रेखांकित किया कि व्हाइट कॉलर अपराध और आर्थिक अनियमितताओं में अंतर समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा, “कई बार व्यावसायिक निर्णय विफल हो जाते हैं या नीतिगत गलतियां होती हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर व्यक्ति की मंशा अपराध करने की थी। कानून को नीयत और परिणाम — दोनों के संतुलन से देखना चाहिए।”
पूर्व सीजेआई ने यह भी कहा कि न्यायपालिका का उद्देश्य केवल सजा देना नहीं, बल्कि समाज में न्याय और विश्वास की भावना बनाए रखना है। उन्होंने कहा, “आर्थिक मामलों में न्यायिक विवेक का प्रयोग सबसे महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इन मामलों का प्रभाव केवल एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरे कारोबारी और वित्तीय ढांचे पर पड़ता है।”
कार्यक्रम में मौजूद विधि विशेषज्ञों और न्यायाधीशों ने भी उनकी इस टिप्पणी का समर्थन करते हुए कहा कि भारत में आर्थिक अपराधों से निपटने के लिए कानून में और स्पष्टता की आवश्यकता है।
न्यायमूर्ति संजीव खन्ना का यह बयान ऐसे समय आया है जब देश में वित्तीय अनियमितताओं, बैंक घोटालों और कारोबारी विवादों से जुड़े मामलों में कार्रवाई को लेकर लगातार बहस चल रही है। उनके बयान को न्यायिक दृष्टिकोण से संतुलन और विवेकपूर्ण जांच की दिशा में एक अहम संदेश के रूप में देखा जा रहा है।





