नई दिल्ली। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति संजय करोल गवई ने न्याय प्रणाली में मध्यस्थता को अहम बताते हुए कहा है कि संवाद और आपसी समझ से न केवल लंबे समय तक चलने वाले विवाद सुलझ सकते हैं, बल्कि समाज और अदालतों पर बढ़ता बोझ भी काफी हद तक कम किया जा सकता है। उन्होंने जोर दिया कि यदि विवादों को आपसी बातचीत और मध्यस्थता के जरिए हल किया जाए तो तनाव भी खत्म होगा और रिश्तों में सुधार आएगा।
सीजेआई गवई का यह बयान ऐसे समय आया है, जब देशभर की अदालतों में लंबित मामलों की संख्या चार करोड़ से अधिक हो चुकी है। उन्होंने कहा कि हर विवाद अदालत के जरिए ही निपटाया जाए, यह जरूरी नहीं है। कई मामले ऐसे होते हैं, जहां आपसी सहमति और समझदारी से समाधान ज्यादा स्थायी और सहज हो सकता है।
‘संवाद ही समाधान’
गवई ने कहा, “मध्यस्थता किसी पक्ष की हार या जीत नहीं है, बल्कि यह दोनों पक्षों के बीच संतुलित और स्वीकार्य समाधान खोजने की प्रक्रिया है। जब लोग आमने-सामने बैठकर बातचीत करते हैं तो तनाव कम होता है और रिश्ते भी बरकरार रहते हैं।” उन्होंने वाणिज्यिक विवादों से लेकर पारिवारिक झगड़ों तक, हर स्तर पर मध्यस्थता को कारगर बताया।
अदालतों का बोझ होगा कम
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि बड़े पैमाने पर मध्यस्थता को अपनाया जाए, तो न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आ सकती है। अदालतों का समय गंभीर और संवेदनशील मामलों पर ज्यादा केंद्रित किया जा सकेगा।
सरकार और न्यायपालिका की पहल
हाल के वर्षों में भारत में वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) तंत्र को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है। सरकार ने मध्यस्थता विधेयक भी पेश किया है, ताकि इसे औपचारिक रूप से न्याय प्रणाली का अभिन्न हिस्सा बनाया जा सके। सीजेआई गवई ने इस दिशा में तेज़ी लाने की अपील की और कहा कि ग्रामीण स्तर से लेकर उच्च स्तर तक, संवाद और सुलह-सफाई की परंपरा भारतीय संस्कृति में गहराई से जुड़ी रही है।
आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मध्यस्थता को व्यापक स्तर पर लागू किया गया तो न केवल न्यायिक ढांचे को मजबूती मिलेगी, बल्कि समाज में सौहार्द और विश्वास भी बढ़ेगा। सीजेआई का यह संदेश न्यायपालिका की उस कोशिश का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें औपचारिक मुकदमों से पहले बातचीत और समझौते की राह को प्राथमिकता देने की दिशा में माहौल तैयार किया जा रहा है।





