मालेगांव ब्लास्ट केस (2006) में NIA की विशेष अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने माना कि विस्फोट तो हुआ, लेकिन अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि मोटरसाइकिल में बम रखा गया था।
फैसले के बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं।
भाजपा: ‘हिंदू कभी आतंकी नहीं हो सकता‘
भाजपा आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने लिखा, “कांग्रेस ने वोटबैंक की राजनीति के लिए भगवा आतंकवाद का झूठ फैलाया और निर्दोषों पर फर्जी केस थोपे। सोनिया गांधी, पी. चिदंबरम और सुशीलकुमार शिंदे जैसे नेताओं को सनातन धर्म से माफी मांगनी चाहिए।”
उन्होंने आगे लिखा, “हिंदू आतंकवादी नहीं हो सकता। गर्व से कहो हम हिंदू हैं।”
ओवैसी: ‘फिर छह लोगों को किसने मारा?’
वहीं AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने फैसले को “निराशाजनक” बताते हुए कहा कि “इस विस्फोट में छह नमाजी मारे गए और 100 से अधिक घायल हुए थे। अदालत ने 17 साल बाद सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को बरी कर दिया, लेकिन सवाल बना हुआ है – उन छह लोगों को मारा किसने?”
ओवैसी ने पूछा कि क्या मोदी और फडणवीस सरकारें इस फैसले के खिलाफ अपील करेंगी, जैसे उन्होंने मुंबई ट्रेन ब्लास्ट मामले में की थी?
उन्होंने दिवंगत एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे का उल्लेख करते हुए कहा कि “करकरे ने इस साजिश का पर्दाफाश किया था और 26/11 में शहीद हो गए। क्या दोषपूर्ण जांच करने वाले अधिकारियों को कोई जवाबदेही दी जाएगी?”
पृष्ठभूमि
8 सितंबर 2006 को मालेगांव में एक मस्जिद के पास हुए सिलसिलेवार धमाकों में 6 लोगों की मौत और 100 से अधिक घायल हो गए थे। इस मामले में पहले कई मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया गया था, जिन्हें बाद में बरी किया गया। फिर NIA की जांच में हिंदुत्व संगठनों से जुड़े नाम सामने आए थे।





