उत्तराखंड में सड़क हादसों की एक नई और गंभीर वजह सामने आई है—नींद और उससे जुड़ी समस्याएं। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) ऋषिकेश के मनोरोग विभाग के शोध में दावा किया गया है कि नींद की कमी, स्लीप डिसऑर्डर और अत्यधिक थकान सड़क दुर्घटनाओं का बड़ा कारण बनते जा रहे हैं।
यह शोध अमेरिका के प्रतिष्ठित क्यूरियस मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, अब तक नशा ही दुर्घटनाओं का मुख्य कारण माना जाता रहा है, लेकिन नए अध्ययन ने नींद से जुड़ी समस्याओं को भी उतना ही बड़ा कारक बताया है।
शोध के मुख्य बिंदु:
• 21% हादसे वाहन चलाते समय झपकी या नींद की स्थिति के कारण हुए।
• 26% दुर्घटनाओं में अत्यधिक थकान से आई नींद जिम्मेदार पाई गई।
• 32% दुर्घटनाओं के पीछे नशा था, लेकिन इनमें अधिकांश चालक नींद की समस्या से भी ग्रस्त थे।
• 68% हादसे सपाट, रोजमर्रा की सड़कों पर हुए—जैसे कॉलोनी, कस्बे या शहर के आंतरिक मार्ग।
• अधिकांश दुर्घटनाएं शाम 6 बजे से रात 12 बजे के बीच हुईं, जब थकान और नशे का असर चरम पर होता है।
शोध का नेतृत्व कर रहे प्रो. रवि गुप्ता और डॉ. विशाल धीमान के अनुसार, अक्टूबर 2021 से अप्रैल 2022 के बीच 1200 सड़क दुर्घटना पीड़ितों पर अध्ययन किया गया। इनमें से 575 घायल स्वयं वाहन चला रहे थे, जिनमें से अधिकतर दोपहिया और तिपहिया वाहन चालक थे।
नींद से जुड़ी सुरक्षा की मांग
शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया कि:
• ड्राइविंग लाइसेंस जारी करते समय नींद से संबंधित जांच को अनिवार्य किया जाए।
• वाहनों में सेंसर या अलर्ट सिस्टम लगाए जाएं, जो चालक को झपकी आने पर सतर्क कर सके।
• चालकों को जागरूक किया जाए कि नींद महसूस होने पर तुरंत रुकें, झपकी लें और फिर वाहन चलाएं।
• कमर्शियल वाहन मालिकों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ड्राइवर पर्याप्त नींद लें और स्लीप डिसऑर्डर से मुक्त हों।
नए अभियान की ज़रूरत
अभी तक राज्य प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे जागरूकता अभियान मुख्य रूप से नशे पर केंद्रित रहे हैं। लेकिन यह शोध बताता है कि सड़क सुरक्षा रणनीतियों में नींद और मानसिक थकान जैसे पहलुओं को शामिल करना अब अत्यावश्यक है।





