Monday, February 23, 2026

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2021 से अब तक 50% से अधिक बाघों की मौत टाइगर रिजर्व से बाहर, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में सर्वाधिक मामले

भारत में बाघों की सुरक्षा को लेकर एक गंभीर तथ्य सामने आया है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 से लेकर अब तक देश में जितने भी बाघों की मौत हुई है, उनमें से आधे से ज्यादा यानी 51 फीसदी मौतें टाइगर रिजर्व से बाहर हुई हैं। ये आंकड़े देश के वन्यजीव संरक्षण तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

एनटीसीए के मुताबिक, 2021 से 2025 तक कुल 667 बाघों की मौत दर्ज की गई, जिनमें से 341 मौतें टाइगर रिजर्व के बाहर हुईं। वर्षवार आँकड़ों की बात करें तो 2021 में 129, 2022 में 122, 2023 में 182, 2024 में 126, और 2025 में अब तक 108 बाघों की मौत दर्ज की जा चुकी है। इनमें टाइगर रिजर्व से बाहर हुई मौतों की संख्या क्रमशः 2021 में 64, 2022 में 52, 2023 में 100, 2024 में 65, और 2025 में अब तक 60 रही है।

महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश टाइगर रिजर्व के बाहर बाघों की सबसे अधिक मौतों के मामले में शीर्ष पर हैं। महाराष्ट्र में अब तक 111 और मध्य प्रदेश में 90 बाघों की मौत टाइगर रिजर्व से बाहर दर्ज की गई है।
वर्ष 2021 में महाराष्ट्र में 23, मध्य प्रदेश में 18, केरल में 5 और तेलंगाना में 4 बाघों की मौत रिजर्व के बाहर हुई।
2022 में महाराष्ट्र में 18, मध्य प्रदेश में 12, केरल और उत्तराखंड में 4-4 मौतें हुईं।
2023 में यह आंकड़ा और भी चिंताजनक रहा, जब महाराष्ट्र में 34, मध्य प्रदेश में 13, केरल और उत्तराखंड में 11-11 तथा कर्नाटक में 6 बाघों की मौत टाइगर रिजर्व से बाहर हुई।
2024 में मध्य प्रदेश में 24 और महाराष्ट्र में 16 मौतें दर्ज की गईं, जबकि 2025 में अब तक महाराष्ट्र में 20, मध्य प्रदेश में 13, केरल में 8 और कर्नाटक में 7 बाघों की मौत रिजर्व क्षेत्र से बाहर हुई है।

एनटीसीए के आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि 2012 से 2024 के बीच कुल 1,519 बाघों की मौत हुई, जिनमें से 634 यानी करीब 42% बाघों की मौत टाइगर रिजर्व के बाहर हुई है। यह आँकड़ा स्पष्ट करता है कि बाघों की बड़ी संख्या संरक्षित क्षेत्रों से बाहर निवास कर रही है और इनकी सुरक्षा के लिए विशेष रणनीति की आवश्यकता है

वर्तमान में भारत में अनुमानित 3,682 बाघ हैं, जिनमें से लगभग 30 फीसदी बाघ संरक्षित क्षेत्रों के बाहर रहते हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों में भी निगरानी, सुरक्षा और मानव-बाघ संघर्ष की रोकथाम पर ध्यान देना आवश्यक हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह प्रवृत्ति बाघ संरक्षण के प्रयासों को कमजोर कर सकती है।

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