Monday, January 12, 2026

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15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए डिजिटल चैंपियन से एनालॉग की ओर: क्यों डेनमार्क बच्चों को स्क्रीन से दूर ले जा रहा है

डेनमार्क को लंबे समय से दुनिया के सबसे डिजिटल देशों में गिना जाता रहा है। ऑनलाइन पब्लिक सर्विसेज़, डिजिटल आईडी और 2011 से ही स्कूलों में टैबलेट—डेनमार्क तकनीक आधारित समाज का वैश्विक मॉडल रहा है। लेकिन अब यही देश शिक्षा और सामाजिक जीवन में एक बड़ा यू-टर्न ले रहा है।

बच्चों में बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं, गिरते शैक्षणिक प्रदर्शन और स्क्रीन पर अत्यधिक निर्भरता को लेकर डेनमार्क की सरकार चिंतित है। इन्हीं आंकड़ों के आधार पर अब देश में “डिजिटल डिटॉक्स” की दिशा में बड़े फैसले लिए जा रहे हैं।

देश भर के स्कूलों और आफ्टर-स्कूल क्लबों में मोबाइल फोन पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। कक्षाओं में फिर से किताबें, लिखावट और पारंपरिक पढ़ाई को बढ़ावा दिया जा रहा है। कई जगहों पर टैबलेट और लगातार स्क्रीन-आधारित शिक्षा की जगह प्री-डिजिटल लर्निंग मॉडल लागू किया जा रहा है।

सबसे बड़ा और चर्चित कदम है—15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रस्तावित प्रतिबंध। नीति निर्माताओं का मानना है कि कम उम्र में सोशल मीडिया का इस्तेमाल चिंता, ध्यान की कमी और सामाजिक अलगाव को बढ़ाता है। यह प्रतिबंध बच्चों को भावनात्मक रूप से मजबूत बनने का समय देने के उद्देश्य से लाया जा रहा है।

डेनमार्क की सरकार साफ करती है कि यह तकनीक के खिलाफ कदम नहीं है, बल्कि संतुलन बनाने की कोशिश है। डिजिटल टूल्स उपयोगी हैं, लेकिन उनका अंधाधुंध इस्तेमाल बच्चों के विकास के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि डेनमार्क का यह प्रयोग दुनिया के अन्य देशों के लिए भी एक संकेत हो सकता है। जब पूरी दुनिया बच्चों के स्क्रीन टाइम और मानसिक स्वास्थ्य पर बहस कर रही है, तब डेनमार्क का यह फैसला एक नई दिशा दिखाता है।

कोपेनहेगन से उठ रही यह आवाज़ अब वैश्विक सवाल बन चुकी है—
क्या भविष्य की शिक्षा में तकनीक से ज़्यादा इंसान को प्राथमिकता देनी होगी?

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