तेहरान/वाशिंगटन (23 मार्च, 2026): पश्चिम एशिया में जारी भीषण और विनाशकारी संघर्ष एक अत्यंत गंभीर और अनपेक्षित मोड़ पर पहुँच गया है। अमेरिका और इजराइल के साथ चल रहे कूटनीतिक और सैन्य गतिरोध के बीच, ईरान ने वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए जीवन रेखा माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले सभी जहाजों पर एक भारी-भरकम और तय शुल्क लगाने का क्रांतिकारी फैसला किया है। ईरानी मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, यह शुल्क 20 लाख डॉलर (करीब 18 करोड़ रुपये) प्रति जहाज होगा। ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के एक वरिष्ठ सदस्य, अलाएद्दीन बोरोजेर्दी ने पुष्टि की है कि यह शुल्क पहले ही लागू किया जा चुका है और इसे सख्ती से वसूला जाएगा। यह अभूतपूर्व कदम वैश्विक ऊर्जा बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, और पश्चिम एशिया की भू-राजनीति के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, जिससे तेल की कीमतों में भारी उछाल और आपूर्ति श्रृंखलाओं के पूरी तरह बाधित होने की आशंका बढ़ गई है।
ईरान का तर्क: युद्ध की कीमत और सुरक्षा शुल्क
ईरानी सरकार ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर शुल्क लगाने के पीछे कई तर्क दिए हैं:
- युद्ध की कीमत: ईरान का मानना है कि अमेरिका और इजराइल के साथ जारी संघर्ष के कारण उसे भारी आर्थिक और मानवीय नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह शुल्क उस नुकसान की भरपाई और युद्ध की कीमत वसूलने का एक माध्यम है।
- सुरक्षा शुल्क: ईरान का दावा है कि वह होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने के लिए भारी संसाधन खर्च कर रहा है। यह शुल्क उस सुरक्षा व्यवस्था को बनाए रखने और क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिए आवश्यक है।
- अमेरिकी प्रतिबंध: ईरान ने इस कदम को अमेरिका द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों का एक मुंहतोड़ जवाब बताया है। उसने स्पष्ट किया है कि वह अपने तेल निर्यात को बाधित करने वाले किसी भी प्रयास को बर्दाश्त नहीं करेगा और अपनी आर्थिक संप्रभुता की रक्षा करेगा।
वैश्विक प्रभाव: तेल संकट और मुद्रास्फीति
ईरान के इस निर्णय का वैश्विक स्तर पर विनाशकारी प्रभाव पड़ने की आशंका है:
- तेल की कीमतों में उछाल: होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल गुजरता है। इस पर शुल्क लगाने से तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, जिससे दुनिया भर में ऊर्जा संकट गहराने की आशंका बढ़ जाएगी।
- आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान: भारी शुल्क के कारण कई जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने से बच सकते हैं, जिससे तेल की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान पैदा हो सकता है। यह भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक बड़ी चुनौती होगी, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए मिडिल ईस्ट पर निर्भर हैं।
मुद्रास्फीति और आर्थिक मंदी: तेल की बढ़ती कीमतों और आपूर्ति में व्यवधान के कारण दुनिया भर में मुद्रास्फीति और आर्थिक मंदी की आशंका बढ़ सकती है। यह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका होगा।





